Sunday, March 6, 2011

JANOKTI : जनोक्ति

JANOKTI : जनोक्ति


लिव इन रिलेशनशिप : एक बहस

Posted: 06 Mar 2011 06:06 PM PST

 


राजधानी दिल्ली के खबरिया हलकों में इन दिनों फ़िर एक लडकी की लाश केंद्र में है । पुलिस , मीडिया और आम आदमी अपने ताने बाने बुन रहा है हालांकि मीडिया पुलिस के काम में से स्टोरी और आम आदमी उस स्टोरी का मतलब समझने में लगे हुए हैं लेकिन इन सबसे अलग मुझे एक बात फ़िर बहुत जोर से चुभ रही है कि एक बार फ़िर ..वही ..एक लडकी । फ़िर । अभी बहुत समय नहीं बीता है जब दिल्ली की एक लडकी की मौत ( जी हां मैं निरूपमा की ही बात कर रहा हूं , जिसे आज मीडिया आपने निजि स्वार्थों और शायद और भी कुछ विशेष कारणों से भूल कर बैठा है ) ने पहले लिव इन रिलेशनशिप को फ़िर औनर किलिंग जैसे शब्दों की भारतीय समाज में पैठ और उसके परिणामों या कहिए कुपरिणामों की तरफ़ ध्यान खींचा था । और जिस तेजी से इस तरह की घटनाओं में वृद्धि हुई है और भविष्य में होती दिख रही है , उससे दो बातें तो बिल्कुल स्पष्ट है । पहली ये कि पश्चिम से आयातित होने वाली ये तमाम अपसंस्कृतियां यदि कल को भारतीय समाज में आत्मसात भी हो जाती हैं तो भी कम से कम संचालक संस्कृति तो कतई नहीं बन पाएगी | दूसरी और ज्यादा महत्वपूर्ण ये कि , पत्रकार और राजनीति में अपना भविष्य देखने वाली महिलाएं भी बार बार जब शिकार के रूप में शोषित शापित होने को मजबूर हैं तो फ़िर इन नियमों के लागू होने से नोरी की परिवर्तित स्थिति का जो प्रोपैगैंडा देखा दिखाया जा रहा है उसकी असलियत यहां खुल कर सामने आ जाती है ।

 

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यहां सवाल ये नहीं है कि लिव इन रिलेशनशिप और समलैंगिकतो या इस जैसा ही कोई व्यवहार जो कि पश्चिमी देशों से ही आयातित होकर आया है । यहां मेरा ईशारा ये वर्तमान में चले रही मुहिमों और दलीलों से है ..नहीं तो बहस उठाने वाले इस बात को उठाते रहे हैं कि लिव इन रिलेशनशिप , समलैंगिकता , मदर सरोगेसी , और ऑनर किलिंग तक का वजूद भारतीय समाज में भी पहले से रहा है । किंतु ये जो यकायक इन परंपराओं को कानूनी मान्यता और सामाजिक स्वीकृति दिलाने की मुहिम चल निकली है ..वो पुरातन वजूद निश्चित रूप से इसके लिए जिम्मेदार नहीं होंगे । इन्हें आज के हालातों और तेजी से बदलने को उद्धत शहरी समाज ने ही इसके लिए इन्हें प्रेरित किया होगा , और कर रहा है । सोच कर देखिए न कि फ़ायर और दोस्ताना जैसी पिक्चरों को बनाने का प्रयोग पहले क्यों नहीं किया गया ?

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हाल ही में दि्ल्ली की एक सुशिक्षित , तेज़ तर्रार , राजनीति हलके में द्खल रखने वाली नवयुवती की लाश बोरे में लावारिस पडी रेलवे स्टेशन से बरामद होती है । क्या उस युवती ने या इस तरह की घटनाओं का शिकार बन जाने वाली तमाम निरूपमाओं और नीतू सोलंकियों ने उस मर जाने वाली स्थिति तक पहुंचने से पहले खुद के लडने का कोई माद्दा नहीं दिखाया , कोई कोशिश नहीं की । ऐसा भी नहीं है कि इस तरह का दु:साहस नहीं हुआ होगा क्योंकि अभी हाल ही में एक विधायक को सरे आम कत्ल करने वाली महिला ने कम से कम अपनी पुत्री को हवस का शिकार होने से तो बचा ही लिया । तो क्या उस वक्त को आने मे समय है जब खबरें कुछ इस तरह की होंगी कि प्यार में धोखा खाई प्रताडित कुछ युवतियों ने अमुक को कुत्ते की मौत मार डाला । ये भी नहीं है कि इन नई परंपराओं ने हमेशा और सिर्फ़ मुश्किलें ही खडी की हैं और परिवर्तन भी शाश्वत सत्य है । लेकिन इसके बावजूद खुद को बदल रहे और अपने बदलाव पर ठसक से इतराते समाज को इस बात का जवाब तो देना ही होगा कि आखिर मौत का कसौटी पर सिर्फ़ …उस आधी दुनिया के लोग ही क्यों चढाएं जाएं । आज भी किसी ने मां ने , किसी पत्नी ने , किसी बहन ने अपने उस पति , भाई , बेटे को गोली से नहीं उडाते सुना मैंने जो कि बलात्कार जैसे घृणित अपराध तक में शामिल हो और वाकई उसका गुनाहगार भी ।

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असल में भारतीय परिवेश और सामाजिक संरचना कुछ इस तरह की है और अब तक बनी हुई है कि उसमें इस तरह के प्रयोगों के प्रति दोहरा नज़रिया रहेगा ही । उदाहरण देखते हैं …….प्रेम दिवस को जो युवक किसी युवती से प्रेम निवेदन करता प्रसन्न दिखाई देता है ..उसी युवक को यदि उसकी बहन भी किसी और से ऐसा ही प्रणय निवेदन सुन कर आग बबूला हो उठता है …क्यों ? कारण स्वाभाविक है और स्पष्ट भी । परिवर्तन , बदलाव , नई संस्कृति हर कोई चाहता है ऐसा कि हो ? लेकिन वही हर कोई ..अपनी बहन की शादी में अपनी बिटिया की शादी में समाज को दहेज जैसी घटिया प्रथा के लिए कोसता है मगर अपने बेटे की शादी का वक्त आते ही उसे जमाने का वो दस्तूर बताता है जिसे निभाया जाना जिंदगी का सबसे बडा मकसद है । इसलिए ये हो सकता है कि आज के युवा वर्ग को बरसों से चली आ रही इन प्रथाओं से एक उकताहट सी हो रही है और कभी जानबूझकर तो कभी अनजाने ही उस सीमा को ठोकर मार कर तोडने पर उतारू है । हो सकता है कि ये दृष्टिकोण इन परंपराओं को सही ठहराने वालों को एक वाजिब कारण दिखता हो और शायद इसीलिए न्यायालय ने भी इन्हीं मानवीय पक्षों को ही देख कर इन्हें कानूनी जामा पहनाने की अनुमति दी है । लेकिन यदि ये सब फ़िर इतना ही ठीक ठीक सा है तो फ़िर आखिर हर थोडे से अंतराल के बाद इसका कोई ऐसा ही परिणां देखने को क्यों मिल रहा है , समाज को ये तो सोचना ही होगा ।

ये नई परंपराएं जो भारतीय समाज की सदियों से मान्य रही परंपराएं और रीतियां थीं , उनको कदम कदम पर चुनौती देती हुई सी लगती हैं , लेकिन सबसे बडी चुनौती ये साबित हो रही है कि आज भी इन्हें समाज ने आत्मसात करना तो दूर रहा , बेझिझक , बेहिचक स्वीकारने को तैयार नहीं है । कहीं कोई किसी अपने/अपनी का कत्ल सिर्फ़ इस वजह से कर देता है कि वो बिना शादी के ही मां बनने का दु:साहस कर बैठी है , तो कोई उसका ही कत्ल कर दे रहा है जिसके साथ ही चल कर उसने कभी इस समाज की वर्जनाओं को लांघा था । लेकिन दोनों ही सूरतों में मुझे कत्ल हो जाने वाली वो युवती ही छली जाती हुई महसूस होती है । तो इसलिए यदि कोई ये कहता है कि ये नई परंपराएं नारी पुरूष की स्थिति को बहुत हद तक बदल रहा है तो मैं हटात ही इत्तेफ़ाक नहीं रख पाता इस बात से । मुझे मेरा कार्यालयीय अनुभव और सामने आए मुकदमे भी मुझे जब हकीकत से रूबरू कराते हैं तो एक बार फ़िर मैं इन नईं परंपराओं के पक्ष में दी जा रही दलीलों को नए सिरे से समझने की कोशिश करता हूं ..और इस बीच एक नई नीतू , एक नई निरूपमा मारी जा चुकी होती है ..सिलसिला बदस्तूर जारी है

नई सदी में नारी

Posted: 06 Mar 2011 08:54 AM PST

पश्चिमी जगत के पुरुष विरोधी रूप से उभरा नारी मुक्ति संघर्ष आज व्यापक मूल्यों के पक्षधर के रूप में अग्रसर हो रहा है । यह मानव समाज के उज्जवल भविष्य का संकेत है। बीसवीं सदी का प्रथमार्ध यदि नारी जागृति का काल था तो उत्तरार्ध नारी प्रगति का । इक्कीसवी सदी का यह महत्वपूर्ण पूर्वार्ध नारी सशक्तीकरण का काल है। आज सिर्फ पश्चिम में ही नहीं वरन विश्व के पिछड़े देशों में भी नारी घर से बाहर खुली हवा में सांस लेरही है , एवं जीवन के हर क्षेत्र में पुरुषों से भी दो कदम आगे बढ़ा चुकी है। अब वह शीघ्र ही अतीत के उस गौरवशाली पद पर पहुँच कर ही दम लेगी जहां नारी के मनुष्य में देवत्व व धरती पर स्वर्ग की सृजिका तथा सांस्कृतिक चेतना की संबाहिका होने के कारण समाज 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ' का मूल मन्त्र गुनुगुनाने को बाध्य हुआ था ।

नारी की आत्म विस्मृति , दैन्यता व पराधीनता के कारणों में विभिन्न सामाजिक मान्यताएं व विशिष्ट परिस्थितियाँ रहीं हैं , जो देश ,काल व समाज के अनुसार भिन्न भिन्न हैं। पश्चिम के दर्शन व संस्कृति में नारी सदैव पुरुषों से हीन , शैतान की कृति,पृथ्वी पर प्रथम अपराधी थी। वह पुरोहित नहीं हो सकती थी । यहाँ तक कि वह मानवी भी है या नहीं ,यह भी विवाद का विषय था। इसीलिये पश्चिम की नारी आत्म धिक्कार के रूप में एवं बदले की भावना से कभी फैशन के नाम पर निर्वस्त्र होती है तो कभी पुरुष की बराबरी के नाम पर अविवेकशील व अमर्यादित व्यवहार करती है।

पश्चिम के विपरीत भारतीय संस्कृति व दर्शन में नारी का सदैव गौरवपूर्ण व पुरुष से श्रेष्ठतर स्थान रहा है। 'अर्धनारीश्वर ' की कल्पना अन्यंत्र कहाँ है। भारतीय दर्शन में सृष्टि का मूल कारण , अखंड मातृसत्ता दृ अदिति भी नारी है। वेद माता गायत्री है। प्राचीन काल में स्त्री ऋषिका भी थी, पुरोहित भी। व गृह स्वामिनी, अर्धांगिनी, श्री, समृद्धि आदि रूपों से सुशोभित थी। कोइ भी पूजा, यग्य, अनुष्ठान उसके बिना पूरा नहीं होता था। ऋग्वेद की ऋषिका -शची पोलोमी कहती है अहं केतुरहं मूर्धाहमुग्रा विवाचानी । ममेदनु क्रतुपतिरू सेहनाया उपाचरेत ऋग्वेद

 

अर्थात -मैं ध्वजारूप (गृह स्वामिनी ),तीब्र बुद्धि वाली एवं प्रत्येक विषय पर परामर्श देने में समर्थ हूँ । मेरे कार्यों का मेरे पतिदेव सदा समर्थन करते हैं । हाँ , मध्ययुगीन अन्धकार के काल में बर्बर व असभ्य विदेशी आक्रान्ताओं की लम्बी पराधीनता से उत्पन्न विषम सामाजिक स्थिति के घुटन भरे माहौल के कारण भारतीय नारी की चेतना भी अज्ञानता के अन्धकार में खोगई थी।

नई सदी में नारी को समाज की नियंता बनने के लिए किसी से अधिकार माँगने की आवश्यकता नहीं है, वरन उसे अर्जित करने की है। आरक्षण की वैशाखियों पर अधिक दूर तक कौन जासका है । परिश्रम से अर्जित अधिकार ही स्थायी संपत्ति हो सकते हैं। परन्तु पुरुषों की बराबरी के नाम पर स्त्रियोचित गुणों व कर्तव्यों का बलिदान नहीं किया जाना चाहिए। ममता, वात्सल्य, उदारता, धैर्य,लज्जा आदि नारी सुलभ गुणों के कारण ही नारी पुरुष से श्रेष्ठ है। जहां ' कामायनी ' का रचनाकार " नारी तुम केवल श्रृद्धा हो" से नतमस्तक होता है, वहीं वैदिक ऋषि घोषणा करता है कि-"३.स्त्री हि ब्रह्मा विभूविथ " उचित आचरण, ज्ञान से नारी तुम निश्चय ही ब्रह्मा की पदवी पाने योग्य हो सकती हो। ( ऋग्वेद )।

नारी मुक्ति व सशक्तीकरण का यह मार्ग भटकाव व मृगमरीचिका से भी मुक्त नहीं है। नारी -विवेक की सीमाएं तोड़ने पर सारा मानव समाज खतरे में पड़ सकता है। भौतिकता प्रधान युग में सौन्दर्य की परिभाषा सिर्फ शरीर तक ही सिमट जाती है। नारी मुक्ति के नाम पर उसकी जड़ों में कुठाराघात करने की भूमिका में मुक्त बाजार व्यवस्था व पुरुषों के अपने स्वार्थ हैं । परन्तु नारी की समझौते वाली भूमिका के बिना यह संभव नहीं है। अपने को 'बोल्ड' एवं आधुनिक सिद्ध करने की होड़ में, अधिकाधिक उत्तेजक रूप में प्रस्तुत करने की धारणा न तो शास्त्रीय ही है और न भारतीय । आज नारी गरिमा के इस घातक प्रचलन का प्रभाव तथाकथित प्रगतिशील समाज में तो है ही, ग्रामीण समाज व कस्बे भी इसी हवा में हिलते नजर आ रहे हैं। नई पीढी दिग्भ्रमित व असुरक्षित है। युवतियों के आदर्श वालीवुड व हालीवुड की अभिनेत्रियाँ हैं। सीता, मदालसा, अपाला,लक्ष्मी बाई ,जोन ऑफ आर्क के आदर्श व उनको जानना पिछड़ेपन की निशानी है।

इस स्थिति से उबरने का एकमात्र उपाय यही है कि नारी अन्धानुकरण त्याग कर ,भोगवादी संस्कृति से अपने को मुक्त करे। अपनी लाखों , करोड़ों पिछड़ी अनपढ़ बेसहारा बहनों के दुखादर्दों को बांटकर उन्हें शैक्षिक , सामाजिक, व आर्थिक स्वाबलंबन का मार्ग दिखाकर सभी को अपने साथ प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होना सिखाये । तभी सही अर्थों में सशक्त होकर नारी इक्कीसवीं सदी की समाज की नियंता हो सकेगी ।

 

 

 

 

उड़ चली नारी

Posted: 06 Mar 2011 07:31 AM PST

घर की चारदिवारी,
घुटती नारी,
बोतल में-

बंद सी,
सहती पीड़ा,
सदियों से,

पुस्तक पोथी,
ने बतलाया,
कारण?

अज्ञान का साया,
पढ़ डालीं पुस्तकें,
तोड़ीं जंजीरें.

ज्ञान से,

आलोकित,
पुंज प्रकाश,
असीमित आकाश,

तोड़ के चारदिवारी,

उड़ चली नारी.

व्यंग्य बाण: क्रिकेट के विशेषज्ञ

Posted: 06 Mar 2011 07:22 AM PST

भारत देवी-देवताओं और अवतारों का ही नहीं, विशेषज्ञों का भी देश है। हर व्यक्ति किसी न किसी बात का विशेषज्ञ होता है। यदि कहीं दस लोग एक साथ बैठे हों, तो उनमें चिकित्सा, ज्योतिष, शिक्षा, पर्यावरण, राजनीति और फिल्म का कम से कम एक-एक विशेषज्ञ अवश्य होगा। हर गांव या बिरादरी में दो-चार रिश्ते कराने और तुड़वाने के विशेषज्ञ भी होते हैं।

कुछ विशेषज्ञ किसी विशेष मौसम में कुकुरमुत्ते की तरह उग आते हैं। आपकी रुचि न हो, तब भी वे 'झाड़े रहो कलक्टरगंज' की तर्ज पर जबरन विशेषज्ञता झाड़ने लगते हैं। यह देखकर कभी-कभी तो उन्हें बनाने वाले भगवान पर ही तरस आने लगता है।

खेती में सैकड़ों प्रयोग करने के बाद बर्बाद हो चुके रामलाल कृषि विशेषज्ञ हैं, तो व्यापार में सब कुछ लुटाकर चाट बेच रहे श्यामलाल उद्योगों के विशेषज्ञ। तीन पत्नियों को तलाक दे चुके जगमोहन परिवार समन्वय का बोर्ड लगाकर लोगों को सलाह दे रहे हैं, तो शादी की उम्र को 25 साल पहले पार कर चुके मनमोहन रिश्ते मिलाने की दुकान खोले हैं।

फटी चटाई पर अपने तोते के साथ जमे कालेराम धन कमाने के मंत्र बताते हैं, तो झोपड़ी में बैठे गोरेमल वास्तुशास्त्र के सिद्धांत। ऐसे लोगों के लिए ही काका हाथरसी ने कभी 'नाम बड़े पर दर्शन छोटे' नामक प्रसिद्ध कविता लिखी थी। आजकल विश्व कप क्रिकेट का दौर है, इसलिए उसके विशेषज्ञ रुपये में चार मिल रहे हैं।

परसों मैं किसी काम से शर्मा जी के घर गया, तो वे अपने परम मित्र वर्मा जी से गंभीर चर्चा में व्यस्त थे।

- क्यों वर्मा जी, आपका क्या विचार है, इस बार क्रिकेट का विश्व कप कौन जीतेगा ?

- इसमें भी कोई सोचने की बात है। इस समय दुनिया भर में अमरीका की तूती बोल रही है, इसलिए वही जीतेगा।

- पर अमरीका तो इस प्रतियोगिता में भाग ही नहीं ले रहा ?

- तो फिर चीन का दावा मजबूत सिद्ध होता है। अब तो अर्थजगत में उसने जापान को भी पछाड़ दिया है।

- वर्मा जी, क्रिकेट के बारे में आप बहुत कम जानते हैं। अमरीका की तरह चीन भी गुलामों वाला यह खेल नहीं खेलता।

- देखिये, आप यह आरोप न लगाएं। क्रिकेट के बारे में जितना मैं जानता हूं, उतना शहर में कोई नहीं जानता होगा। यदि अमरीका और चीन इस बार प्रतियोगिता में भाग नहीं ले रहे, तब तो सीधी सी बात है, जो टीम अधिक गोल करेगी, वही कप ले जाएगी।

- अपने दिमाग का इलाज कराओ वर्मा जी। क्रिकेट में हार-जीत रन से होती है, गोल से नहीं।

- आप चाहे जो कहें; पर यह निश्चित है कि जो देश इस प्रतियोगिता में भाग ले रहे हैं, उनमें से ही कोई कप जीतेगा।

- पर आपने भारत की संभावनाओं के बारे में कुछ नहीं बताया ?

- इस बारे में मुझे बड़ी निराशा है। टीम में ऐसे लोग रखने चाहिए, जो आवश्यकता होने पर कप छीन सकंें।

- क्या मतलब ?

- मतलब यह कि यदि महाबली खली को टीम का कप्तान बनाया जाता, तो विपक्ष के आधे खिलाड़ी बिना खेले ही मैदान छोड़ जाते।

- कैसे ?

- उसके बल्ले की मार से गेंद इतनी दूर जाती कि दूसरी टीम वालों को उसे वापस लाने में कई घंटे लग जाते। तब तक वह सैकड़ों रन बना लेता; पर कप्तान बना दिया धोनी को।

- धोनी का लोहा तो पूरी दुनिया मान रही है वर्मा जी ?

- खाक मान रही है। इससे अच्छा तो किसी धोबी को बना देते। उसके धोबीपाट दांव के आगे सब घुटने टेक देते। खली के साथ सुशील पहलवान और मुक्केबाज विजेन्द्र को भी लेना चाहिए था।

- तुमसे तो बात करना बेकार है। तुम क्रिकेट को पहलवानी समझ रहे हो। इसमें ताकत नहीं, तकनीक काम आती है।

- नाराजगी थूक दो शर्मा जी। आजकल जमाना ताकत का ही है। भले ही वह शरीर की हो या पैसे की, सत्ता की हो या गुटबाजी की। ज्ञान की हो विज्ञान की। तकनीक का ही दूसरा नाम तिकड़म है। जिसके पास तिकड़म है, वह अंदर है और बाकी बाहर। सत्ता के गलियारों से लेकर दलाल स्ट्रीट के कारोबार और क्रिकेट की टीम से लेकर गुलाममंडल खेल के भ्रष्टाचार तक यही सत्य है।

वर्मा जी की इस 'गुगली' से शर्मा जी 'क्लीन बोल्ड' हो गये। मैं भी 'हिट विकेट' या 'एल.बी.डब्ल्यू' होने की बजाय 'नो ब१ल' का संकेत करते हुए 'गली' से निकलकर 'बाउंड्री पार' हो गया। मेरी रुचि भी आम जनता की तरह सस्ते राशन में है, विश्व कप में नहीं।

 

 

 

पाक ध्वज में काल कल्वित- सफ़ेद रंग

Posted: 06 Mar 2011 07:08 AM PST

पाक के इकलौते अल्पसंख्यकों के मंत्री शाहबाज़ भट्टी की दिन दिहाड़े हत्या कर पाक के कट्टरवादी मुसलामानों ने सारे विश्व को एक स्पष्ट सन्देश दे दिया है. यह सन्देश है की पाक में कुरआन और मुहम्मद को न मानाने वालों के लिए कोई स्थान नहीं. भट्टी पाक के एक मात्र ईसाई मंत्री थे. भट्टी ईशनिंदा क़ानून के मुखालिफ थे जिसे पाक में अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने में प्रयुक्त किया जाता रहा है. इसे कुफ्र क़ानून से भी जाना जाता है. पाक में इस्लाम के पैरोकार कुफ्र और काफ़िर को मिटाने वाले को गाजी कह कर सम्मानित करते है. पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या करने वाले बाड़ी गार्ड को भी गाजी के रूप में सम्मानित किया गया.

एक और तो पाक के प्रधान मंत्री युसूफ रज़ा गिलानी अल्पसंख्यकों की सलामती के बड़े बड़े दावे करते हुए फरमा रहे हैं कि पाक के राष्ट्र ध्वज का सफ़ेद हिस्सा अल्पसंख्यकों का प्रतीक है. गिलानी ने ईशनिंदा क़ानून में फेर बदल से भी इनकार किया और इस कानून के कारन अल्पसंख्यकों के पलायन को भी बेवजह बताया. गिलानी ने दावा किया की इंडोनेशिया में कोई ईशनिंदा कानून नहीं फिर भी गैर मुसलमान मुल्क छोड़ कर जा रहे हैं. – गिलानी के इस ब्यान से ज़ाहिर है की मुस्लिम बहुल देश जहाँ कुरआन और शरिया का कानून नासिर है वहां काफिरों के लिए सहज जीवन जीना मुहाल है.? दूसरी ओर आंतरिक सुरक्षा मंत्री रहमान मालिक साफ़ साफ़ शब्दों में आगाह कर रहे हैं कि ‘हमारे मुल्क में सिविल वार से खून खराबा होना तय है. पिछले दिनों पाक के ६६ वर्षीय हिन्दू विधायक ने पाक से भाग कर भारत में शरण ली. पाक में कुफ्र के नाम पर बढ़ रही अल्पसंख्यकों की कठिनाईयों पर ईसाई सांसद अकरम मसीह गिल ने कहा कि सबसे कठिन दौर में हैं अल्पसंख्यक- उन्हें अंधी गली में धकेला जा रहा है. प्रसिद्ध लेखिला तसलीमा नसरीन ने तो यहाँ तक कह दिया कि सभी अल्पसंख्यकों को पाक छोड़ देना चाहिए. तसलीमा नसरीन ने अपने ट्वीट पर ‘अब तीसरा कौन’ आशंका भी ज़ाहिर की. भाट्टी की हत्या के बाद ,नयूक्लेअर सईन्स्दा ,निबंधकार,राजनैतिक रक्षा विश्लेषक व् काय्देआज़म युनिवर्सटी -इस्लामाबाद में फिजिक्स विभाग की मुखिया डॉ.प्रोफ. परवेज़ हूद भाई ने ‘ पाक के भविष्य पर गहरी चिंता जताई .

ईशनिंदा या कुफ्र के क़ानून के तहत जन . जिया उल हक़ के समय से अब तक ६०० काफिरों पर केस दर्ज हुए – कुछ को तो जेल में ही मौत के घाट उतार दिया गया. पाक में आम हिन्दू या ईसाई की तो बात छोडो शाहबाज़ भट्टी और अकरम मसीह गिल जैसे मंत्री व् सांसद भी पाक के मुस्लिम समाज में अपने ईसाई नाम के साथ नहीं रह सकते उन्हें भी मुस्लिम नाम रखने पड़ते हैं.

गत छह दशकों में पाक में इस्लाम और मुहम्मद के नाम पर अल्पसंख्यकों पर इस कदर जुल्मोसितम ढाए गए की लगभग ३५ मिलियन अल्पसंख्यक यातो मार दिए गए या फिर अपनी जान बचाने के लिए मुसलमान हो गए और बहुत सारे पाक छोड़ भाग गए. आंकड़े गवाह हैं – १९४७ में जब जिन्ना ने सेकुलर इस्लामिक राज्य की स्थापना की और अल्पसंख्यकों के जान ओ माल और धर्म की पूरी हिफाज़त का वायदा किया तो उस वक्त पाक में २४% अल्पसंख्यक थे और कुल आबादी थी ३० मिलियन . २०१० आते आते आबादी तो हो गई १७०

मिलियन अर्थात ५ गुना से अधिक और अल्प संख्यक रह गए मात्र ३% जिसमें १.५% हिन्दू और १.५% ईसाई हैं और यह संख्या भी तेज़ी से घट रही है.

मानवाधिकार के ठेकेदार और भारत के सेकुलर शैतान ‘हिन्दुओं और ईसाइओ ‘ पर पाक में हो रहे अमानवीय अत्याचारों पर अपराधिक चुप्पी साधे हुए हैं . और तो और पाक में ईश निंदा के नाम पर हो रही राजनैतिक हत्याओं पर भारत के किसी भी कांग्रेसी या कौम्नष्ट ने एक शब्द नहीं बोला ….. पांच राज्यों में होने जा रहे चुनावों में कहीं मुस्लिम वोट बैंक न फिसल जाएं !!!!!!!

 

 

Saturday, March 5, 2011

JANOKTI : जनोक्ति

JANOKTI : जनोक्ति


रोइए उस हिंदुस्तान के लिए जो खो गया है

Posted: 04 Mar 2011 09:03 PM PST

हमारे देश ने इतनी तरक्की की है कि हम दुनिया के दूसरे देशों से प्रगति में मुकबला करने काबिल हो गये हैं। स्वाधीनता के पहले हम जहां सुई तक नहीं बना सकते थे, आज विमान तक बनाने लगे हैं और अब तो हमारा हौसला चंद्रमा तक को नाप लेने का है। हम दुनिया के उन महान गणतंत्रों में गिने जाते हैं, जहां वाणी आजाद है, हवा आजाद है और विचार आजाद हैं। परतंत्रता की बेड़ियों की मुक्ति के बाद से ही गणतंत्र पर हमारी आस्था अक्षुण्ण और अटल है। बीच के कुछ अवधि के अंधेरे को छोड़ दें तो गणतंत्र का आलोक अपने पूरे गौरव के साथ देश के आलोकित कर रहा है। हम तकनीक में दुनिया से किसी मायने में उन्नीस नहीं हैं। जहां तक साहित्य का प्रश्न है हमारे लेखक (अंग्रेजी वाले ही सही) विश्व स्तर पर समादृत और पुरस्कृत हो चुके हैं और हो रहे हैं। ऐसे में हमें एक भारतीय या कहें हिंदुस्तानी होने में गर्व है लेकिन इस गर्व के साथ एक बड़ा सा लेकिन जुड़ा हुआ है। हम जिस गति से आगे बढ़े हैं,उससे कहीं दूनी गति से हमारा चारित्रिक पतन हुआ है। प्रशासन के निचले स्तर से लेकर शीर्ष तक व्याप्त भ्रष्टाचार, नीति की जगह सीना तान कर सबको मुंह चिढ़ाती अनीति और देश की जनता के धन की जम कर लूट यही है हमारी प्रगति और हमारे गणतंत्र (इसे गन तंत्र कहें तो ज्यादा बेहतर होगा क्योंकि जिसके हाथ में गन (बंदूक ) है आज उसी की तूती बोलती है)का आज का हासिल। अब तो देश की सत्ता की दशा-दिशा भी बाहुबली तय करते हैं। विधायक हों या सांसद उनकी कृपा बिन विजय का मुकुट पहन ही नहीं सकते। इन बाहुबलियों से कई अब भी संसद और विधानसभाओं की शोभा बढ़ा रहे हैं। इनकी हैसियत और रुतबे का पता इसी से चलता है कि ये जेल में रह कर भी चुनाव लड़ते और जीतते रहे हैं। पिछले चुनाव में इन पर तनिक अंकुश भले ही लगा हो लेकिन इनका रुतबा खत्म हो गया हो ऐसा नहीं कहा जा सकता। जहां तक सच्चे और सही उम्मीदवारों का प्रश्न है तो या तो वे खड़े होने का साहस नहीं कर पाते, और अगर ऐसा करते भी हैं तो बाहुबली के गुर्गे या तो उन्हें जबरन बैठा देते हैं या डर के मारे सारे वोट बाहुबलियों को ही पड़ जाते हैं।
वैसे देश के जागरूक युवा वर्ग के चलते आज नहीं तो कल बाहुबलियों का पराभव होना ही है। गणतंत्र के लिए ऐसा होना आवश्यक भी है क्योंकि कोई भी गणतंत्र गुंडातंत्र होकर ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकता। आज की जो स्थिति है उसमें जिस तरह से बड़े-बड़े घोटाले सामने आ रहे हैं और उनमें जिस तरह से मंत्री स्तर तक के लोगों को जुडा पाया जा रहा है, वह एक ऐसे गणतंत्र के लिए जो दुनिया में एक अनोखी मिसाल है,एक तरह से खतरे की घंटी है। जनता कर के रूप में जो धन देती है उसकी किस कदर लूट मची है, इसके एक नहीं अनेक उदाहरण हाल के दिनों में सामने आये हैं। चाहे राष्ट्रमंडल खेलों का घोटाला हो या भी टू जी स्पेक्ट्रम की नीलामी में ली गयी करोड़ों की घूस, ये सारे मामले देश को कठघरे में ला खड़ा करते हैं। सत्य, अहिंसा और सदाचार की मूर्ति रहा भारत, कभी विश्वगुरु कहा जाने वाला भारत आज कहां है? जिसके मंत्री तक घूस के कीचड़ में गले तक डूबे हों उसमें गर्व करने के लिए क्या बचा रह जाता है?मानाकि सरकार ने देश की जनता को सूचना का अधिकार जैसा ब्रह्मास्त्र देकर बड़ा ही पुनीत कार्य किया है,इसके चलते जनता को प्रशासन या सरकार के किये धत्कर्म पर उंगली उठाने का साहस और जरिया तो मिला है लेकिन बावजूद इसके भ्रष्टाचारियों के हौसले पस्त नहीं हुए। वे सीना ठोंक कर जनता के धन को लूट रहे हैं और देश को बेच रहे हैं। देश आज किस बात पर गर्व करे?क्या इन लुटेरों पर जो सरकारी साधन बेचने में घूस खा कर अपनी ही सरकार को करोड़ों का चूना लगा रहे हैं? क्या उन पर जो ठंड़े घरों में बैठ रेगिस्तान की तपन के दर्द को महसूस करने का नाटक कर रहे हैं?क्या उन पर जो बाढ़ का मुआयना आसमान से कर लौट जाते हैं और उस पानी में अपने चरण भी नहीं भिगोते जिसमें देश की एक बड़ी आबादी ऊभचूभ कर रही होती है? क्या उन बिचौलिये नेताओं पर जो मुसीबत के मारे बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए आया अनाज या तंबू वगैरह लूटने (हड़पने कहें तो ज्यादा उचित होगा) में भी नहीं लजाते?या कि नेताओं के उन गुर्गों पर जो अपने इलाके में राजा जैसा बरताव करते हैं और जिनके चलते मुल्क की बड़ी जनता सांसत-आफत में रहती है?या उन पर जिन्हें सिर्फ अपनी सुख-सुविधाओं की चिंता है देश में भुखमरी और कर्ज की मार से अकाल मौत चुनने वाले किसानों की फिक्र नहीं?आंकड़े उठा कर देख लीजिए देश में पिछले कुछ सालों में भुखमरी और कर्ज के मारे से त्रस्त जितने किसानों ने आत्महत्या की है,वह इनकी परेशानी से उदासीन प्रशासकों के मुंह पर कालिख पोतने के लिए काफी है।
हमारे देश में योजनाओं का हाल यह है कि यह जिन लोगों के लिए बनती हैं उन तक या तो पहुंच नहीं पातीं या फिर पहुंचती भी हैं तो बिचौलियों के माध्यम से। वैले नरेगा व मनरेगा जैसी योजनाओं काफी सफल रही हैं और इनके सुफल भी देखने को मिले हैं लेकिन देश के सीमांत व्यक्ति तक सुख औरसलीके की जिंदगी और सामान्य सुविधाएं पहुंचाने का काम अब तक होना शेष है। जिस देश में आज भी आबादी का बड़ा हिस्सा दूषित जल पी रहा हो, इलाज के अभाव में जहां का बचपन जिंदगी जीने से पहले मौत के मुंह में चला जाता हो और जहां युवा पीढ़ी का बड़ा हिस्सा बेरोजगार हो उस देश को इस बारे में गंभीरता और संजीदगी से सोचना और काम करना चाहिए।
हम कुछ सवालों से घिरे थे कि हमारे पास गर्व करने के लिए क्या है। जवाब साफ हैं कि हमारे पास आज भी गर्व करने के लिए बहुत कुछ है। हमारे वीरता और जीवट से भरे-पूरे सैनिक जिनका दुनिया में कोई सानी नहीं और जिनकी चौकस निगाहों और हिमालय से भी बुलंद हौसलों के चलते हमारी सीमाएं सुरक्षित हैं और जिनके चलते हम चैन की नींद सो सकते हैं। हम अपनी न्यायपालिकाओं पर गर्व कर सकते हैं जो आज भी स्वतंत्र और स्वच्छ हैं। जिनके साहसिक निर्णय कई बार प्रशासकों की नींद तक हराम कर देते हैं और ऐसे में बरबस मुंह से उनके लिए कोई शब्द निकलता हो तो यही 'न्याय की जय हो,अन्याय का क्षय हो'। हमारे पास गर्व करने के लिए सुंदरलाल बहुगुणा जैसे पर्यावारण प्रेमी योद्धा हैं जिन्हें हम वृक्षमित्र भी कह सकते हैं। उनके अनथक श्रम और सत्प्रयास से हजारों पेड़ लालची लकड़ी चोरों के हाथों अकाल मौत का शिकार होने से बच गये। पूज्य और श्लाघनीय हैं देश के ऐसे सपूत। हमें गर्व है कि भारत ने ही विश्व को बाबा साहब आमटे जैसा व्यक्तित्व दिया जिन्होंने कुष्ठ रोगियों की सेवा में अपना जीवन सौंप दिया। भारत के इस दूसरे गांधी की सेवानिष्ठा की विरासत आज उनका परिवार निरंतर जारी रख रहा है। हम गर्व कर सकते हैं ऐसे हजारों समाजसेवियों पर जो समाज के दुख-दर्द को अपना समझते और उसे दूर करने के लिए तत्पर रहते हैं। यही हमारे देश की सच्ची पहचान हैं, यही आदर्श हैं। देश में गर्व करने के लिए और भी बहुत कुछ है ऐसे में अंधेरा भले ही घना हो लेकिन यकीन है कि प्रकाश पुंज अब भी बाकी हैं। इन्हें आप सच्चे और कर्तव्यनिष्ठ शिक्षकों,दूसरों का दुख हरने के लिए अपना सुख-चैन भूल जाने वाले चिकत्सकों और ऐसा प्रशासकों या राज नेताओं में देख सकते हैं जिनके सामने दूसरो की भलाई के आगे अपने सुख,अपनी सुविधाएं गौण लगती हों। आज भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है क्योंकि जिस दिन इस देश से ऐसे लोग मिट जायेंगे वह दिन मानव सभ्यता के लिए वह काला दिन होगा, जब अनाचार का बोलबाला होगा और हर सच्चा इनसान आंसुओं में डूबा होगा।
हमने जो कुछ खो दिया है उस पर बिसूरना या उसके लिए दुख करना भी जरूरी है। वोट के लालची, मक्कार राजनेताओं के चलते देश से भाईचारा, प्रेम और वह सौहार्द मिट गया है जो कभी इस देश की पहचान होता था। आज वोट के लिए ये स्वार्थी राजनेता आदमी-आदमी या कहें भाई-भाई के बीच खाई खोद रहे हैं। देश में जातिवाद का बोलबाला है और यह राजनीति में भी हावी है। आज प्रत्याशी की जीत –हार जाति पर आधारित हो गयी है। जहां जिस जाति का बाहुल्य वहां उसी जाति का प्रत्याशी खड़ा होने लगा है। ऐसे में जाहिर है कि वह जीत कर उसी जाति विशेष के भले की बात सोचेगा,बाकी लोग उसकी सोच की प्राथमिकता के दायरे से दूर होंगे। देश ने बहुत कुछ खोया है। सामाजिक समरसता खो गयी है। गांव जहां किसी एक घर के दुख-दर्द में गांव की पूरी आबादी जुट जाती थी,अब हर जाति के हिसाब से कई हिस्सों में बंट गये हैं और उन हिस्सों की सोच बस अपने हिस्से तक ही सिमट कर रह गयी है। आधुनिकता की घुसपैठ ने गांव की लोककलाओं वहां की शाश्वत सुंदरता में ग्रहण लगा दिया है। कभी तीज-त्यौहार गांवों में नया रंग भरते थे अब वे भी फीके पड़ गये हैं। मनोरंजन के आधुनिक साधनों ने गांवों की कजरी की तान और आल्हा के जोश पर भी चोट की है। अब ये या तो खत्म हो चुके हैं या खत्म हो जायेंगे। लोकगीत जो कभी भक्ति और सामाजिक समस्याओं पर होते थे, अब अश्लीलता की सारी हदें पार कर चुके हैं। इनका एक-एक शब्द अब आपको गरम पिघले शीशे की तरह चुभेगा। अगर आपने अपनी लज्जा को तिरोहित कर दिया है तब आपमें ये गीत नशीली सिहरन भर सकते हैं,जिसे अंग्रेजी में टिटलाइजेशन कहते हैं। मानाकि कि लोकगीतों में चुहबाजियां पुरानी बात है,जिन लोगों को गांव-गिराम की बारातों में जाने का मौका मिला होगा, उन्हें बारात की जीमने के वक्त या दूसरे नेगचार में गारी सुन कर जरूर वैसी ही सिहरन या पुलकन हुई होगी जैसी पैदा करने के लिए आज के बोलियों या भाषाओं के गीत नारी को बेपरदा और बेआबरू करने लगे हैं।
भारत या हमारे हिंदुस्तान की पहचान धीरे-धीरे खोती जा रही है। हम पर पश्चिम की नकल का जो भूत सवार है वह हमारी प्राचीन अस्मिता और पहचान को कहीं का नहीं छोड़ेगा। जिस हिंदुस्तान में पश्चिम सुकून और मोक्ष की तलाश में आता है वह सुख-चैन, मौज-मस्ती की जिंदगी के लिए पश्चिम का मुंहताज है। पश्चिम ऐसी शैली से ऊब चुका है और उससे उपजे दुष्परिणामों पर पशेमान और हैरान-परेशान भी है। वहां कुंआरी कन्याएं मां बन रही हैं, धड़ाधड़ शादियां टूट रही हैं और वर्जनाएं तो वहां हैं ही नहीं जो कुछ हद तक किसी भी सुसंस्कृत और शालीन समाज के लिए जरूरी हैं। अगर ऐसी ही प्रगति होती है,यही सामाजिक उत्शान है तो प्रभु करे मेरे देश को ऐसी प्रगति न मिले। हमने जो खोया है,हमारी जो गौरवशाली परंपरा थी,जो तेजी से छीज रही है आइए उसका मातम मनाएं। आइए उस खो गये हिंदुस्तान पर आंसू बहायें और सोंचे कि क्या हम इस अधोपतन को रोकने के लिए कोई सार्थक प्रयास कर सकते हैं। या कम से कम इस दिशा में कोई आवाज उठा सकते हैं। जाहिर है मेरी तरह आपमें से कुछ लोग उसके लिए दुखी होंगे जो हमसे खो गया है।

Friday, March 4, 2011

JANOKTI : जनोक्ति

JANOKTI : जनोक्ति


लोकतंत्र के आगे बौद्धिक लोकतंत्र -33

Posted: 04 Mar 2011 08:16 AM PST

विश्वीय दृष्टिकोण, स्थानीय कर्म

बौद्धिक जनतंत्र के लिए स्थानीय हितों की रक्षा सर्वोपरि होता है – राष्ट्र, क्षेत्र, गाँव, आदि के सापेक्ष. जबकि विकासशील विश्व में जनतंत्र के अंतर्गत प्रत्येक उत्तम वस्तु निर्यात कर दी जाती है उस विदेशी मुद्रा के लिए जिस के उपयोग से घटिया वस्तुएं देश में लाई जाती हैं. यह किसी व्यावसायिक इकाई के लिए हितकर प्रतीत हो सकता है किन्तु राष्ट्र और समाज के लिए अनेक प्रकार से अनुत्पादक सिद्ध होता है और बौद्धिक दृष्टि से अनैतिक भी है.

यहाँ एक मौलिक प्रश्न उभरता है – विश्वीय दृष्टिकोण की आवश्यकता ही क्या है? इसका हमारे पास एक अति उत्तम उत्तर है. यदि लोग जो चाहें, उन्हें सरकार द्वारा वही सब उपलब्ध कराया जाए तो वे संतुष्ट हो सकते हैं. किन्तु बौद्धिक विश्व इससे संतुष्ट नहीं हो सकता. लोग केवल वही चाह सकते हैं जो वे जानते हैं, किन्तु विश्व में उनके ज्ञान के अतिरिक्त भी बहुत कुछ होता है जो उन्हें शासन द्वारा उपलब्ध कराया जाना चाहिए. इससे शासन में लोगों की आस्था सुदृढ़ होती है और विश्वीय विकास से लोगों की सेवा संभव होती है. इसके लिए शासकों के विश्वीय दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य होता है.

विश्वीय दृष्टिकोण से स्थानीय कर्म संलग्न होने से शासन द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विकसित उत्पादों को देश में आयात की अनुमति प्राप्त ना होकर उन उत्पादों के देश में ही उत्पादन एवं लोगों द्वारा उपभोग उत्प्रेरित होता है. इससे देश में व्यवसाय और रोजगार के नए अवसर विकसित होते हैं जिनसे व्यक्तिगत और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होती है.

शासन का विश्वीय दृष्टिकोण देश की अर्थव्यवस्था के विश्वीकरण से भिन्न प्रक्रिया है. विश्वीकरण में विश्व-स्तरीय कर्म अपनाया जाता है जो पूरी तरह अव्यवहारिक होता है जब कि विश्वीय दृष्टिकोण में केवल विकास का विश्वीय दर्शन अपनाया जाता है जिसे स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुकूल किया जाकर स्थानीय कर्मों में उसका उपयोग किया जाता है. इससे विकास प्रक्रिया स्थानीय कर्मों से संचालित होती है.

वस्तुतः, भूमंडल पर प्रशासनिक और भौगोलिक सीमाओं की उपस्थिति के कारण विभिन्न स्थानों पर भिन्न परिस्थितियों का सृजन होता है जिनके कारण विश्वीय कर्म संभव नहीं हो सकता. इसलिए कर्म स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप स्थानीय स्तर पर ही संभव होता है. केवल दृष्टिकोण ही विश्वीय हो सकता है जिसे स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार स्थानीय कर्म में परिणित किया जाता है. .

स्थानीय दृष्टिकोण से सीमित स्थानीय कर्म होने से स्थानीय विकास स्थानीय स्तर तक ही सीमित रहता है जिसका लाभ अन्य स्थानों को प्राप्त नहीं हो पाता. विश्वीय दृष्टिकोण अपनाए जाने से दूसरे स्थानों के विकास का ही लाभ नहीं उठाया जाता, स्थानीय विकास का लाभ भी सुदूर स्थानों को प्राप्त होता है. इस प्रकार विश्वीय दृष्टिकोण विकास प्रक्रिया को विश्व स्तर तक विस्तृत करता है.

उपरोक्त के अतिरिक्त, विश्वीय दृष्टिकोण से संपन्न स्थानीय कर्म केवल कर्म-स्थल हेतु ही उपयुक्त नहीं होता अपितु उसी प्रकार के अन्य स्थलों के लिए भी उपयोगी सिद्ध होता है. उदाहरणार्थ, विश्वीय दृष्टिकोण के साथ एक छोटे से गाँव में किया गया कर्म उस प्रकार के अन्य गाँवों में भी विकास के लहर का सृजन करता है. इस लहर के सृजन का कारण यह है कि दृष्टिकोण को स्थानीय पारिस्थितिकी हेतु अनुकूलित कर लिया गया होता है जिसे उसी पारिस्थितिकी के अन्य स्थानों पर भी सरलता से लागू किया जा सकता है.

दिशाहीन आम बजट उर्फ़ राग बेमौसम

Posted: 04 Mar 2011 08:07 AM PST

मित्रों,भारत का आम बजट पेश हुए कई दिन हो चुके हैं.मैंने पहले से सोंच रखा था कि १३ मार्च को झारखण्ड लोक सेवा आयोग की प्रारंभिक परीक्षा में शामिल हो लेने के बाद ही इस विषय पर कुछ लिखूंगा लेकिन मन कुछ इस तरह बेचैन हो उठा कि कलम उठानी पड़ी.मित्रों,बजट किसी भी देश का ऐसा वार्षिक वित्तीय विवरण होता है जिससे देश की दशा और सरकार की दिशा का पता चलता है लेकिन इस बार के बजट से न तो देश की दशा का ही पता चलता है और न ही सरकार देश को किस दिशा में ले जाना चाहती है अतिशक्तिशाली इलेक्ट्रोन सूक्ष्मदर्शी से अवलोकन करने पर भी इसका पता चलता है.
बजट पेश होने से पहले पूरे भारत में उम्मीद की अन्तर्वर्ती धारा बह रही थी.लोगों को आशा थी कि वित्त मंत्री महंगाई से जली हुई और इस जले पर नमक हर दफ्तर में सुविधाशुल्क देने को विवश जनता को राहत देने के लिए कोई-न-कोई कदम उठाने की घोषणा अवश्य करेंगे.लेकिन इन विषयों की चर्चा तो दूर बजट में इस बात का कोई संकेत तक नहीं था कि सरकार इन समस्याओं को गंभीर मानती भी है.जबकि बजट से पहले आई आर्थिक समीक्षा में महंगाई और भ्रष्टाचार का उड़ते-उड़ते ही सही जिक्र किया गया था.ऐसा क्यों हुआ और सरकार की नीयत क्या है यह तो बेहतर तरीके से सरकार में शामिल लोग ही बता सकते हैं;हम तो सरकार के भीतर की हलचल को बस अनुमानों के आईने में ही देख सकते हैं.
इस बार के बजट में आम नागरिकों को आयकर में प्रतिमाह १७१ रूपये की नियत छूट दी गई है और बदले में सर्विस टैक्स के रूप में प्रति माह हजारों रूपयों का बोझ लाद दिया गया है.इतना ही नहीं वित्त मंत्री इस साल मुद्रास्फीति के कम-से-कम ८.५ प्रतिशत होने का अनुमान भी लगा रहे हैं यानि आम जनता अपनी कुल कमाई में से कम-से-कम ८.५ प्रतिशत के क्षरण के लिए भी तैयार रहे.शायद इसी स्थिति को छटांक लेना और छटाँक नहीं देना और महंगाई में आटा गीला होना कहते हैं.
ऐसा भी नहीं है कि वित्त मंत्री महंगाई के वास्तविक कारणों से पूरी तरह से नावाकिफ हों.अगर ऐसा होता तो उनके बजट भाषण में द्वितीय हरित क्रांति का जिक्र तक नहीं होता.हमारे वित्त मंत्री द्वितीय हरित क्रांति को साकार होते हुए देखना तो चाहते हैं लेकिन उन्हें इसके लिए कोई जल्दीबाजी भी नहीं है.तभी तो उन्होंने बजट में इस अवश्यम्भावी क्रांति के लिए मात्र ४०० करोड़ रूपया निर्धारित किया है.पूरा पूर्वोत्तर,जहाँ पर यह कथित क्रांति होनी है;पिछले दो वर्षों से घोर अनावृष्टि का सामना कर रहा है.क्षेत्र में पीने के पानी की भी कमी हो रही है लेकिन सरकार यहाँ की जनता को हरित क्रांति का दिवास्वप्न दिखा रही है.जनमोहिनी-मनमोहिनी सरकार मात्र ४०० करोड़ रूपये में पूरे पूर्वोत्तर भारत की कृषि में क्रांति कर देना चाहती है.शायद उसका फूंक मारकर पहाड़ उड़ा देने के करतब में गंभीर विश्वास है.हालाँकि धर्मनिरपेक्ष प्रणव ने रामचरितमानस की चाहत फूंकी उड़ावन पहाड़ू पंक्ति पढ़ी है या नहीं मैं यकीं के साथ नहीं कह सकता.वर्तमान जलवायविक स्थितियों में जब तक क्षेत्र की सभी नदियों को एक-दूसरे से जोड़ नहीं दिया जाता;हरित क्रांति तो दूर की कौड़ी है ही,क्षेत्र में वर्तमान खाद्यान्न उत्पादन स्तर को बरक़रार रख पाना भी संभव नहीं है.जाहिर है कि वित्त मंत्री अगर इस तथाकथित क्रांति के प्रति सचमुच गंभीर होते तो बजट में इसके लिए कई लाख करोड़ रूपये का प्रावधान करते न कि सिर्फ ४०० करोड़ रूपये का.
मित्रों,हम जानते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था की हालत इस समय दयनीय है.बजट बनाते समय एक तरफ जहाँ वित्त मंत्री को देश में उच्च विकास दर को बनाए रखना था तो वहीँ दूसरी और उनके सामने मुद्रास्फीति को भी ८.५ प्रतिशत के स्तर पर स्थिर रखने की चुनौती थी.हालाँकि मुद्रास्फीति की यह दर भी वर्तमान परिस्थितियों में जनता को कष्ट ही देगी;इसमें संदेह नहीं.वित्त मंत्री अगर साहस दिखाते तो १९२९ की महामंदी के समय जिस तरह फ्रैंकलिन डिलानो रूजवेल्ट ने अमेरिका में न्यू डील की घोषणा की थी,वैसी ही कोई वजनदार योजना की घोषणा करते.इससे बेरोजगारी भी दूर होती और देश को दीर्घकालिक लाभ भी होता.हो सकता है कि इससे मुद्रास्फीति कुछ और ज्यादा हो जाती लेकिन जनता की जेब में ज्यादा पैसा तो आता ही;देश के समक्ष सदियों से मुंह बाए खड़ी भुखमरी और मूल्य वृद्धि की स्थायी समस्या का भी स्थायी समाधान हो जाता.
मित्रों,शायद मैंने कुछ ज्यादा ही उटपटांग तुलना कर दी है.मुझे क्रांतिकारी रूजवेल्ट की घोर यथास्थितिवादी और मजबूर मनमोहन सिंह या प्रणव मुखर्जी से तुलना नहीं करनी चाहिए थी.लेकिन जब कोई ४०० करोड़ रूपये में ही भारत जैसे विशाल देश में हरित क्रांति कराने लगे तो इतिहास के पन्नों को पलटना ही पड़ता है.प्रणव मुखर्जी बड़े भारत के बहुत बड़े नेता हैं.इसलिए वे अगर गलती भी करते हैं तो बहुत बड़ी ही करते हैं.शायद बहुत बड़ा करने के चक्कर में ही वे खाद्य तेल,सब्जियां,मोटे अनाज और डेयरी उत्पादों के उत्पादन को बढ़ावा देनेवाली पाँच अतिमहत्वकांक्षी परियोजनाओं को मात्र ३००-३०० करोड़ रूपये दे गए.हद तो उन्होंने ४०० करोड़ रूपये में हरित क्रांति करके ही कर दी थी अब बारी बेहद करने की थी.मित्रों,कोई भी वित्त मंत्री जब किसी योजना के लिए राशि का आवंटन करता है तो उसके पीछे कोई-न-कोई तर्क होता है,तथ्य होता है.दादा के पास तर्क नहीं है;कुतर्क है.वे कहते हैं कि उन्होंने इन ५ योजनाओं के लिए ३००-३०० करोड़ रूपये इसलिए दिए हैं क्योंकि उनका शुभ अंक ३ है.दादा,अगर तीन के गुणांक में ही राशि देना चाहते थे तो उन्हें कम-से-कम ३०००-३००० करोड़ रूपये देने चाहिए थे.३००-३०० रूपये में क्या होगा और क्या नहीं होगा पता नहीं लेकिन लक्ष्य तो पूरा नहीं ही होगा.वैसे दादा ने शायद इस संभावित आलोचना से बचने के लिए ही इन क्षेत्रों में उत्पादन वृद्धि के लिए कोई लक्ष्य रखा ही नहीं है.मित्रों,जिस तरह प्रश्न-पत्र में सिर्फ कठिन प्रश्न ही नहीं होते क्योंकि इससे परीक्षार्थी के आत्महत्या कर लेने की सम्भावना बढ़ जाती है उसी तरह इस बजट में भी सिर्फ जुबान को जलाकर रख देने वाली मिर्च ही नहीं है कुछ मिठाइयाँ भी है लेकिन किंचित.बुनियादी ढांचा को दुरुस्त करने और सामाजिक क्षेत्र के लिए आबंटन में भारी वृद्धि की गयी हैं;लेकिन सच्चाई यह भी है कि चूंकि यह आवंटन पहले से काफी कम था सिर्फ इसलिए वृद्धि जोरदार दिखाई दे रही है.
कुल मिलकर उद्गम से मुहाने तक यह बजट बेसुरा है और खटराग में निबद्ध है.यह बजट दिशाहीन होने की अंतिम परिणति तक दिशाहीन है और इसमें की गयी सारी घोषणाएं समय की मांग के विपरीत है.अगर सरकार को जनता व जनाकांक्षा की रंचमात्र भी चिंता होती तो वह बजट में महंगाई और भ्रष्टाचार को कम करने और मिटाने को प्रमुखता देती.अगर उसके पास इसके लिए धन की कमी थी तो वह विदेशों से कालेधन को वापस लाने की घोषणा करती न कि धनाभाव और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पेट्रोल के दाम बढ़ने का रोना रोती और न ही जनता खड़ी होती अपने उजड़े हुए घर की दहलीज पर ठगी-सी,अन्यमनस्क.हमें उम्मीद थी कि २०११-१२ का बजट अच्छा है या बुरा;यह अनिवार्यतः एक अनिर्णायक विवाद का विषय होगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं;बल्कि यह बजट तो बजट के औचित्य पर ही सवालिया निशान लगा गया.लगता है कि सरकार ने यह सोंचकर यह बजट पेश किया है कि चूंकि ऐसा होता ही रहा है तो हम भी ऐसा कर ही लेते हैं.वास्तव में यह बजट है ही नहीं बल्कि इसे पेश करके करके एक भ्रष्ट और निकम्मी सरकार द्वारा अपनी बेगारी को टाला गया है.

वर्तमान

Posted: 04 Mar 2011 08:01 AM PST

नया उजागर हो रहा घोटाला हर रोज
फिर भी मुस्का कर वह देतें हैं हर पोज
शर्म नाम की चीज से उनका क्या सम्बन्ध
बेशर्मी से कर रहे सत्ता का  वे भोग

लूट २ कर देश का धन रख आते विदेश
कंगला  करने पर तुले ये गद्दार अनेक
क्यों कि उन को मिल गया लूट तन्त्र का राज
कैसे आगे चलेगा यहाँ राज और काज

बिका मिडिया कर रहा द्रोही के गुणगान
जितना जिस का धन मिला उतना उस का गान
रेट सभी के तय हुए यशोगान अनुसार
जिधर दिखी थाली परात उधर रात भर नाच

भगवा गली हो गई यह वैटिकन राग
जय चन्दों की देश में रही सदा भरमार
भारत वासी थक चुके सुन २ के ये बात
समय आगया है यहाँ युवा शक्ति अब जाग

कब तक ऐसीं चलेंगी दिग्गी जैसी चाल
गिरे हुए जमीर के लोगों की भरमार
बस मैडम को खुश करें चाहे जो हो जाय
देश धर्म से क्या उन्हें देश भाड़ में जाय

आम लोगों की भी सोच होती भाई साहब

Posted: 04 Mar 2011 07:27 AM PST

कथित योग गुरु रामदेव बाबा के अवगुणों के प्रति लोगों को जागरूक करना धीरे-धीरे खतरनाक होता जा रहा है। अब तो आलम यह है कि बाबा रामदेव के खिलाफ एक शब्द बोलने और लिखने वाला व्यक्ति बाबा के समर्थकों द्वारा कांग्रेसी ठहरा दिया जाता है। बाबा के अंधे भक्तों को क्या इतनी भी अकन नहीं है कि आम नागरिकों की भी एक सोच या विचारधारा होती है।

यह पोस्ट लिखने में मुझे तकलीफ हो रही है, क्योकि कुछ रामदेव बाबा के अंधे भक्त बाबा को सही साबित करने के लिए कुछ भी अनर्गल बात कह रहे है। इसके लिए अपना छोटा सा दिमाग भी लगाना मुनासिब नहीं समझ रहे है। मेरी उन तमाम रामदेव भक्तों से गुजारिश है कि बाबा की तरफदारी भी करनी है, तो तर्कों के आधार पर करो, कुतर्क मत करो।

कुछ समय पहले मैंने रामदेव बाबा के काले चिट्ठे खोले के लिए एक पोस्ट लिखी थी। इसपर मुझे यह प्रतिक्रिया मिली कि यह पोस्ट मैंने कांग्रेसियों के कहने पर लिखी है। कईयों ने तो मुझे पेड पोस्ट लिखने का भी आरोपी बना दिया है। और तो और बहुतों ने मुझे यह समझाइश दी है कि बाबा के बारे में ज्यादा मत लिखो नहीं तो उनके भक्त मेरा जीना दूभर कर देंगे। क्या यही है एक कथित संत से ज्ञान पाने वाले भक्त? शायद हाँ… वो ढोंगी आज की युवा पीढ़ी को बरगला रहा है, और हम भटकते जा रहे है। भाई साहब विचारधारा क्या होती है? क्या सिर्फ कांग्रेस, भाजपा, कमुनिष्ट व्यक्ति की ही कोई विचारधारा हो सकती है, क्या एक साधारण नागरिक की कोई सोच नहीं होती। शर्म आती है मुझे आज की पीढ़ी पर, जो किसी भ्रष्ट पर अंधा भरोसा करने लगती है। रामदेव बाबा कहते है कि वह भ्रष्टाचारियो की मौत बनकर आयें है। और लोग इस पाखंडी की बातें बड़े इत्मीनान से सुन रहे है। रामदेव बाबा क्या न्यायाधीश या कानून है, जो किसी को भी मौत के घात उतारने की बात कर रहे है। बाबा को तो यह कहना था कि वो भ्रष्टाचारियो को जेल पहुचाने में कोई कसार नहीं छोड़ेंगे। रामदेव बाबा सिर्फ युवाओं को भड़का रहे है। ताकि अपना स्वार्थ सिद्ध कर सके। पूँजीपतियो के साथ हर वक्त रहने वाला बाबा क्या सचमुच यह सोचता है कि वह भ्रष्टाचार को मिटा सकता है। बाबा के साथ जुड़े कुछ पूँजीपतियो के बारे में मै भी जानता हूँ कि वो कितने इमानदार है। न्यूज़ चैनल चलाने वाले और लोहा का धंधा करने वालों के साथ जुड़कर वह कौन सा महँ काम करने वाला है। यह मै जानता हूँ। आयकर का छापा पड़ता है, तो बाबा मंत्रियों से सेटिंग कर उस कारवाई को रुकवा देते है। मै जानता हूँ कि बाबा के महँ बनाने कि कोशिश में मेरी लड़ाई ज्यादा दिन इसलिए नहीं चल पाएगी, क्योकि बाबा बहुत जल्द मुझपर अपने बाहुबली भक्तों के सहारे दबाव बनवायेंगे। ख़राब-पतियों के साथ घुमने वाला क्या कुछ नहीं करवा सकता है।

Thursday, March 3, 2011

JANOKTI : जनोक्ति

JANOKTI : जनोक्ति


पगला गए है भूरिया, रामदेव बाबा को बना दिया धर्म का ठेकेदार !!

Posted: 03 Mar 2011 07:05 AM PST

क्या बाबा रामदेव धर्म के ठेकेदार है, जो भाजपा उससे डरे? केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया का बुधवार को रतलाम जिला के सर्किट हाउस में आयोजित पत्रकारवार्ता में यह कहना की भाजपा को रामदेव बाबा से डरने की बात कहना महज हास्यप्रद ही है। ऐसा लगता है कि भूरिया भाजपा के सहयोगी ही हो गए है, जो ऐसी बात करने लगे हैं।

विद्वान् भूरिया का रामदेव बाबा के सम्बन्ध में यह कहना उनके मानसिक रूप से सेवा-निवृत्त होने का इशारा कर रहा है। आखिर रामदेव बाबा कौन है? एक योगी? एक संत? एक जनप्रतिनिधि? या फिर एक व्यापारी?

यदि हम यह सोचें कि रामदेव बाबा एक योगी है, तो इस सोच में बहुत उलझाने होंगी। क्योकि बाबा ने योग को राजनीती में आने को एक हथियार बनाया। और यह जरूरी नहीं कि जिसके पास हथियार हो, वह योद्धा ही हो। हथियार तो चोर- उचक्के , पाकिटमार, कातिल, कसाई भी रखते है। तो क्या हम रामदेव बाबा को संत माने? शायद नहीं, क्योकि संत राजनीति करते है, लोगों को भड़काते नहीं है। संत भ्रमित नहीं करते है। बाबा रामदेव ने तो काले धन को लेकर तो देश-भर में भ्रम कि स्थिति पैदा कर दी है। वह कहते है कि विदेशी बैंकों में काला धन रखने वालों कि सूची है, लेकिन इस बात को कहने के महीनो बाद भी रामदेव बाबा ने उनके नाम उजागर नहीं किये। इसका मतलब यह ही कि बाबा संत नहीं है। क्या रामदेव बाबा एक जनप्रतिनिधि है?

अब इसमें सवाल यह है कि जनप्रतिनिधि क्या है। मेरे ख़याल से जनप्रतिनिधि वह होता है, जो जनता का प्रतिनिधत्व करता है। रामदेव बाबा का उनके चेले-चौपाट ही समर्थन करतें है। चेला और जनता में अंतर है। अब सवाल उठता है कि क्या बाबा रामदेव व्यापारी है? मेरे ख्याल से आज कि तारीख में रामदेव बाबा बहुत बड़े ब्रांड बन गए है। योग के प्रचारक है। यह बात अलग है कि अब वह योग सिखाने से ज्यादा भाषण – बाजी ज्यादा करते है।

उन्होंने दवाइयों का प्रचार भी किया है, ऐसा करके उन्होंने करोड़ों की संपत्ति भी कमाई है। हम यह मान सकते है की बाबा एक व्यापारी ही है। कांतिलाल भूरिया का यह कहना है कि बाबा रामदेव के राजनीति में आने से भाजपा को खतरा है। उनके राजनीति में आने की संभावनाओं से भाजपा में घबराहट है क्योंकि भाजपा धर्म की ठेकेदार है और बाबा रामदेव राजनीति में आए तो वे भाजपा से धर्म का ठेका ले लेंगे। अब भूरिया को कौन समझाए कि एक व्यापारी धर्म का ठेकेदार कैसे हो सकता है।

 

प्रचारक परिवार के रत्न अरविन्द कृष्णराव चैथाइवाले

Posted: 03 Mar 2011 06:59 AM PST

श्रद्धांजलि -

संघ के वरिष्ठ प्रचारक, विश्व हिन्दू परिषद में केन्द्रीय मंत्री तथा सेवा विभाग के अखिल भारतीय प्रमुख श्री अरविन्द कृष्णराव चैथाइवाले का दिनांक 3 मार्च, 2011 को ब्रह्ममुहूर्त में प्रातः तीन बजे दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में निधन हो गया। गत 27 फरवरी को दोपहर में भीषण हृदयाघात के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया था। चिकित्सकों ने भरपूर प्रयास किया; पर वे उन्हें बचा नहीं सके।

अरविन्द जी का जन्म नागपुर के पास कलमेश्वर नामक स्थान पर सात सितम्बर, 1939 को हुआ था। मूलतः उनका परिवार महाराष्ट्र में सोलापुर जिले के बारशी गांव का था। इनके पिता श्री कृष्णराव अध्यापक थे। इस परिवार में अरविन्द जी सहित छह भाई तथा तीन बहिनें थीं। भाइयों में सबसे बड़े बाबूराव ने सर्वप्रथम शाखा जाना प्रारम्भ किया और उसके बाद क्रमशः सभी भाई स्वयंसेवक बने। संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी एवं फिर श्री बालासाहब देवरस से सबके बहुत मधुर संबंध रहे। एक विशेष बात यह है कि छह में से तीन भाई संघ के जीवनव्रती प्रचारक बने। ऐसा उदाहरण शायद दूसरा नहीं होगा।

सबसे बड़े बाबूराव ने नागपुर में अध्यापक रहते हुए 1954 से 1994 तक संघ के केन्द्रीय कार्यालय में श्री गुरुजी और फिर श्री बालासाहब का पत्र व्यवहार संभाला। दूसरे मधुकर राव और तीसरे सुधाकर राव भी नौकरी करते हुए संघ कार्य में सक्रिय रहे। चैथे भाई शरद राव 1956 में प्रचारक बने। विदर्भ में अनेक दायित्व निभाते हुए इन दिनों वे नागपुर के केन्द्रीय कार्यालय पर रहकर स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं। पांचवे भाई शशिकांत जी 1961 में प्रचारक बने। असम में अनेक स्थानों पर रहते हुए वे प्रांत तथा सहक्षेत्र प्रचारक रहे। अब वे संघ की केन्द्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं।

अरविन्द जी ने सिविल इंजीनियर का डिप्लोमा कर कुछ वर्ष नागपुर तथा अमरावती में पी.डब्ल्यू.डी में नौकरी की। उसके बाद 1970 में वे भी अपने भाइयों की परम्परा के वाहक होकर प्रचारक बन गये। उन्हें सर्वप्रथम उड़ीसा में बालासोर जिले में भेजा गया। शीघ्र ही वे ओड़िया भाषा सीखकर वहां समरस हो गये। उन दिनों श्री बाबूराव पालधीकर वहां प्रांत प्रचारक थे। उनके साथ रहते हुए अरविन्द जी क्रमशः विभाग और फिर प्रांत प्रचारक बने। इस दौरान उन्होंने उड़ीसा के काम को अनेक नये आयाम प्रदान किये। उड़ीसा वनवासी बहुल निर्धन क्षेत्र है। अरविन्द जी ने सुदूर क्षेत्रों में सघन प्रवास कर अनेक नई शाखाएं तथा वनवासी गांवों में सेवा केन्द्र प्रारम्भ किये। उन्होंने अनेक साधु-सन्तों को भी संघ से जोड़ा। आपातकाल में कुछ समय उन्होंने भूमिगत रहकर कार्य किया; पर फिर वे पुलिस के हाथ आ गये और उन्हें कटक के कारागार में रहना पड़ा।

1998 में उन्हें विश्व हिन्दू परिषद में बंगाल और उड़ीसा का क्षेत्र संगठन मंत्री बनाया गया। कोलकाता को केन्द्र बनाकर उन्होंने परिषद की गतिविधियों का चहुंओर विस्तार किया। 2001 में उन्हें विश्व हिन्दू परिषद में केन्द्रीय सहमंत्री तथा सेवा विभाग का अखिल भारतीय सहप्रमुख बनाकर दिल्ली बुला लिया गया। पूरे देश में प्रवास कर उन्होंने सेवा कार्यों की एक विशाल मालिका निर्माण की। 2010 में तत्कालीन सेवा प्रमुख श्री सीताराम अग्रवाल के निधन के बाद अरविन्द जी केन्द्रीय मंत्री तथा सेवा प्रमुख बने।

सादा जीवन, उच्च विचार के धनी, अध्ययनशील और शांत स्वभाव वाले स्वर्गीय श्री अरविन्द चैथाइवाले का जीवन न केवल प्रचारकों अपितु सब स्वयंसेवकों व कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणास्पद है।

 

 

 

 

Wednesday, March 2, 2011

JANOKTI : जनोक्ति

JANOKTI : जनोक्ति


लोकतंत्र के आगे बौद्धिक लोकतंत्र -32

Posted: 02 Mar 2011 08:07 AM PST

भृष्टाचार उन्मूलन

वर्तमान में अथवा भूतकाल में अनेक उच्च एवं प्रतिष्ठित पदों पर आसीन व्यक्ति एवं उनके संगठन भारत में फैले उच्च स्तरीय भृष्टाचार से दुखी हैं और इसके उन्मूलन हेतु कार्य कर रहे हैं. यह सही है कि उच्च स्तर पर हो रहा भृष्टाचार ही निम्नतम स्तर तक पहुंचा है क्योंकि भृष्टाचार सदैव उच्च स्तर से नीचे की ओर उत्प्रेरित होता है, न कि निम्न स्तर से उच्च स्तर की ओर. इस प्रकार यदि उच्च स्तरीय भृष्टाचार समाप्त हो जाता है तो निम्नस्तरीय भृष्टाचार भी एक दिन स्वतः समाप्त हो जाएगा. किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि निम्न स्तरीय भृष्टाचार को यथावत स्वीकार किया जाता रहे अथवा इसे प्रोन्नत किया जाता रहे, और इसके उन्मूलन की तभी आशा की जाये जब उच्च-स्तरीय भृष्टाचार समाप्त हो जायेगा.

भृष्टाचार भारतीय जन-मानस की रग-रग में रच-बस गया है, किसी दुल्हन की हथेलियों पर लगी मेहंदी की तरह, जिसे तुरंत समाप्त नहीं किया जा सकता. इसकी समाप्ति के लिए दीर्घ-कालिक सतत प्रयास करने होंगे, प्रत्येक स्तर पर. यह भी सही है कि निम्न स्तर पर भृष्टाचार समाप्ति के प्रयास प्रायः निष्फल अथवा अस्थायी होते हैं. किन्तु निम्न स्तर पर भृष्टाचार उन्मूलन के प्रयास एक जन-आन्दोलन को प्रेरित करते हैं, जो क्षमता उच्च स्तर पर भृष्टाचार उन्मूलन के प्रयासों में नहीं होती. ये प्रयास अधिकाँश में न्यायालयी संघर्षों द्वारा किये जाते हैं.

भृष्टाचार उन्मूलन के लिए यह आवश्यक है कि भृष्ट लोगों के मानस में भय व्याप्त हो जिसकी सामर्थ्य जन-आन्दोलन में होती है जो निम्न-स्तरीय संघर्षों से उत्प्रेरित होते हैं. किन्तु निम्न-स्तरीय भृष्टाचार उन्मूलन के प्रयास कालजयी नहीं होते, इसलिए उच्च स्तर पर भृष्टाचार उन्मूलन के बिना स्थायी नहीं हो सकते. इस प्रकार भृष्टाचार उन्मूलन के प्रयास दोनों स्तरों पर किये जाने चाहिए. इसके लिए सूत्र यह है कि जो जहां है, वहीं भृष्टाचार पर प्रहार करे और सतत करता रहे.

निम्न स्तर पर भृष्टाचार उन्मूलन में सबसे बड़ी बाधा यह है कि जन-मानस ने इसे जीवन-शैली के रूप में स्वीकार कर लिया है और वह इसके विरुद्ध स्वर बुलंद कर जन-संघर्ष के लिए तैयार नहीं है. यहाँ तक कि जो भी इसके लिए छुट-पुट प्रयास किये जाते हैं, स्वयं जन-मानस ही उनकी अवहेलना करता है, तथा यदा-कदा अपनी स्वीकार्य जीवन-शैली बनाए रखने के लिए ऐसे संघर्षों के विरुद्ध कार्य भी करता है. इस अवहेलना और विरोध के कारण निम्न-स्तरीय संघर्ष दीघ-जीवी सिद्ध नहीं होते. साथ ही साधनहीनता के कारण इनका दमन भी सरल होता है. इन्हें बनाए रखने के लिए उच्च स्तरीय सहयोग आवश्यक होता है.

इस चर्चा से जो कार्य-शैली प्रभावी प्रतीत होती है, उसके विविध आयाम निम्नांकित हैं -

उच्च स्तर पर भृष्टाचार उन्मूलन के प्रयास अवश्य हों और इसके लिए व्यापक संगठनात्मक ढांचा विकसित किया जाये.

निम्न स्तर पर भी भृष्टाचार उन्मूलन के प्रयास हों, जिनके माध्यम से जन-मानस में संशोधन हो, और जन-संघर्ष उत्प्रेरित किये जाएँ. इसके लिए निम् स्तर पर भी स्थानीय संगठन बनें.

निम्न स्तरीय प्रयासों को सतत बनाए रखने के लिए उच्च स्तर से सहयोग और संरक्षण प्रदान किया जाए.

उच्च स्तरीय प्रयासों के लिए जहां कहीं जन-आन्दोलन की आवश्यकता हो, निम्न स्तरीय जन संघर्ष इनमें यथाशक्ति सहयोग प्रदान करें.

इस प्रकार भृष्टाचार उन्मूलन के लिए शक्ति और जन-चेतना दोनों के समन्वय की आवश्यकता है जो क्रमशः उच्च और निम्न स्तरों पर उपलब्ध होते हैं, अतः उच्च एवं निम्न दोनों स्तरों पर प्रयासों का महत्व है और दोनों में सहयोग अपरिहार्य है.

जयचंदों की श्रेणी

Posted: 02 Mar 2011 08:01 AM PST

आश्चर्य होता है … !

कि सूरज सर पर चमक रहा हो; और कोई उसे अनदेखा करे, वो भी आखें होते
हुए…! दोपहर के चमकते सूर्य को अँधा भी बेशक देख नहीं पाता; पर उसकी गर्मी से तो वह भी बेहाल हो कर उसकी चरम स्थिति का अंदाजा लगा लेता है। पर जिन्होंने आँखों पर चश्मा लगा रखा हो वो भी लोहे का उनके लिए क्या कहें ?
कुछ
ऐसा ही हमारे देश के वो लोग कर रहे हैं; जिन्हें “कुछ लोगों” ने बुद्धिजीवी मान रखा है। वो देश की समस्याओं पर अपने लेख लिखते हैं, समाचार चैनलों पर बहस-मुबाहसों में जाते हैं, और एक बड़े आन्दोलन की पैरवी भी करते हैं, देश के लोगों से जागने की अपेक्षा भी करते हैं, किसी सर्वमान्य नेता की आवश्यकता पर भी ध्यान आकर्षित करते हैं ।
पर
; जो “बहस” आम जनता के बीच शुरू हो चुकी है कि 'अब तो अगर कुछ भला इस देश का हो सकता है तो बाबा रामदेव” ही कर सकते हैं; और किसी से उम्मीद नहीं', इस बात को नजरंदाज कर जाते हैं ।
जिस
बड़े आन्दोलन और जनता से जागने की वह अपेक्षा करते हैं वह भी आरम्भ हो चुका है। और सर्वमान्य नेता के रूप में बाबा राम देव जी लोगों के दिलों में छा गए हैं। पर ये लोग पता नहीं क्यों उन्हें अनदेखा कर रहे हैं ? जबकि देश के मुख्य मुस्लिम व्यक्तित्व, मुख्य इसाई व्यक्तित्व, और अधिकतर सामाजिक लोग बाबाजी की आवाज में आवाज मिला रहे हैं।
तब
मेरे मन से आवाज निकली कि ऋषियों के वंशज समझ रहे हैं- असुरों के वंशज भड़क रहे हैं।

शोध का विषय है

कि “एक खानदान के पूर्वजों” से लेकर आज तक के वंशजों द्वारा किया गया और किया जा रहा नुकसान, "कुछ लोगों (पत्रकारों)और कुछ" समाचार घरानों ( इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट) को इस गाँधी ( उस गाँधी नहीं ) खानदान के पैर दबाने में और तेल मालिश करने में धन के आलावा और क्या मिलता है ? जहाँ तक ये सोचते हैं कि सुरक्षा भी मिलती है तो सब जानते हैं कि कांग्रेस अपने ही लोगों को “दुनिया से कूच” करवाने के लिए बदनाम है ।
आज
के समय में किसी भी बात को छुपाना बड़ा मुश्किल है; और पुराने “लिखित दस्तावेज” भी सब इनके “कुकर्मों” के मिल गए हैं; फिर भी इन लोगों को ऐसा क्यों लगता है कि लोग अभी भी मूर्ख बन जायेंगे ?
इन्हें एक “दुत्कारे
हुए नेता” की पूर्वांचल स्वाभिमान यात्रा तो दिखती है; पर जो सम्पूर्ण देश में चल रही है “भारत स्वाभिमान यात्रा” नहीं दिखाई देती। ये क्रिकेट पर तो दिनभर चौबीसों घंटे अपनी रोटियां सेंक सकते हैं; पर जो देश की अस्मिता से जुड़ा मुद्दा है उस पर देश भक्तों की आँखों को तरसाते हैं। उलटे “उस तरह” के लोगों को अपने चैनलों पर दिखाते हैं जो “उस खानदान” के एक बच्चे की चरण वंदना में अपने “टूटे हुए पांव” और “रीढ़ की हड्डी का लचीलापन” भी भूल जाते हैं। जी हाँ मैं “बिट्टा” की बात कर रहा हूँ। ईटीवी उत्तर प्रदेश पर राहुल गाँधी की गन्दगी ( बुराईयाँ ) छुपा रहा था ।
इन्हें दिल्ली की रैली भी केवल एक नजर को दिखाई दी। फिर हम चैनल बदलते रहे । पर वो नहीं दिखाई दी । फिर ! अपने को देश का समाज का हितैसी बताते नहीं थकते।

तब मेरे मन से आवाज निकली कि; भ्रष्टाचार को संस्कार मत बनाओ- पिछलग्गुओ होश में आओ, होश में आओ- होश में आओ ।

देश द्रोह
कोई मुझे देशप्रेम की परिभाषा समझाए। क्या केवल सरकार की, नेताओं की भक्ति करना देशभक्ति है ? या अपने देश की संस्कृति-संस्कार, पूर्वजों का सम्मान, सभ्यता-साहित्य और यहाँ रहने वाले लोगों से प्रेम करे ये देशप्रेम है ?
इस द्रष्टि से मेरी नजर में वो सभी देशद्रोही हैं जो भारत स्वाभिमान के इस आन्दोलन को अनदेखा कर रहे हैं, वो अब अधिक दिन इस देश की जनता को नहीं बरगला सकते । अपनी पीठ भले ही थपथपा सकते हैं पर आने वाले समय में जयचंदों की श्रेणी में गिने जायेंगे।
तब
मेरे मन से आवाज निकली;
कौन देशभक्त कौन गद्दार-जान गयी  जनता हो गयी समझदार ।

शेर की शहादत स्थल पर कुत्ता “विजेता”

Posted: 02 Mar 2011 07:56 AM PST

शहीदों की चिताओं पर, लगेंगे हर बरस मेले !

वतन पर मिटने वालों का, यहीं बाकि निशां होगा!

देश ने कभी यहीं वादा आजादी की लड़ाई में क़ुरबानी देने वाले अपने अमर शहीदों के लिए किया था ! लेकिन बड़े अफसोस की बात हैं आज उसी देश में एक महान शहीद की शहादत स्थल पर शहादत दिवस के दिन प्रशासनिक सहमति एवं मीडिया के तत्त्वाधान में कुत्तों की प्रदर्शनी लगाई जा रही हैं !हम बात कर राहें हैं भारतभूमि के महान सपूत चंद्रशेखर आजाद की जिनका जन्म मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के भांवरा गाँव में 23 जुलाई 1906 को माता जगरानी देवी और पिता पंडित सीताराम तिवारी के संतान के रूपमें हुआ था ! विलक्षण प्रतिभा के धनी चंद्रशेखर में राष्ट्रीयता बचपन से ही कूट-कूट के भरी थी !सन 1921 में एक विश्मयकारी और ऐतिहासिक घटना के बाद मात्र 15 वर्ष की अवस्था में बालक चंद्रशेखर से आजाद बनने वाले चंद्रशेखर आजाद जीवनपर्यंत आजाद ही रहे और 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के कंपनी बाग़ ( अब आजाद पार्क ) में फिरंगियों से लोहा लेते हुए खुद की गोली से वीरगति को प्राप्त हुए थे !इस शहीद स्थली (आजाद पार्क) के अतीत में जाने पर पर मन और गौरवान्वित हो उठता हैं क्योंकि यह ऐतिहासिक पार्क पहले मेंवातियों की बस्ती हुआ करती थी ! 1857 के ग़दर में इस बस्ती के बहादुर मुसलमानों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था ! जिसके परिणामस्वरूप बौखलाए ब्रिटिश हुकूमत नें इसे तहस नहस करके कम्पनी बाग़ की नींव डाली थी ! जो अंगरेजी हुक्मरानों की सुहानी शाम के लिए ऐशगाह हुआ करती थी ! अगर कोई भारतीय गलती से इसमे प्रवेश कर गया तो उसके लिए कड़े दंड का प्रावधान था ! स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी इस बाग़ में हमारी गुलामी और उनकी प्रभुता का प्रतिक विक्टोरिया टावर ( पुरातत्व विभाग के संरक्षण में जिसको छूना भी अपराध हैं ) शान से खड़ा हैं ! विगत 27 फरवरी को उसी आजाद पार्क में चंद्रशेखर आजाद के शहादत स्थल पर शहादत दिवस के दिन वेस्ट कैनल क्लब और दैनिक जागरण के लघु संस्करण आई-नेक्स्ट अखबार के द्वारा प्रशासनिक सहमति से कुत्तों की प्रदर्शनी लगवाई गई जहाँ कुत्तों ने रैम्प पर चहलकदमी की !इस घटना का विरोध शहर में जयहिंद फौन्देशन और कुछ राष्ट्रवादी संगठनों द्वारा किया जा रहा था !लेकिन प्रशासन की बेरूखी बनी रही और सभी विरोधों को दरकिनार करते हुए इस कुत्ता प्रदर्शनी को भारीसुरक्षा के बीच पूरा किया गया !राष्ट्रीयता को शर्मसार कर देने वाली इस घटना के बाद भी ना प्रशासन को शर्म आई और ना ही अपने आपको लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहने का दंभ भरने वाली मीडिया को ! ज्ञातव्य हो की यह पहला मौका नहीं हैं जब किसी शहीद की शहादत का अपमान किया गया हो !अपने आपको बुद्धिजीवियों का शहर कहने वाले इसी इलाहाबाद में काकोरी कांड के महान शहीद रोशन सिंह को जिस भवन में फांसी दी गई थी ! वो स्थल एक स्मारक के रूप मेंअपेक्षा करता हैं ! लेकिन प्रशासन की घोर उदासीनता के चलते वह भवन आज तक सरकारी गोदाम के रूप में उपयोग किया जा रहा हैं किया जा रहा हैं !अब यह सवाल उठना लाजिमी है की बार-बार होने वाले ये अपमान महज प्रशासनिक लापरवाही के परिणाम मात्र हैं या इसे जन बूझकर प्रायोजित किया जा रहा हैं ! क्योंकि जिस तरह से हमारी पीढ़ी को क्रांतिकारियों के जीवन मूल्यों और उनके दर्शन से दूर किया किया जा रहा हैं वह किसी साजिश का हिस्सा प्रतीत होती हैं ! जिसकी एक बानगी दिखनी भी शुरु हो गयी हैं !उदहारण के लिए- आज देश के एक-एक बच्चे को ऋतिक रोशन और अभिषेक बच्चन के बाप का नाम तो मालूम हैं लेकिन वह भगत सिंह और राम प्रसाद बिस्मिल को नहीं जनता ! आज देश के लोग जातिवाद, धर्मवाद, और क्षेत्रवाद की बात तो करते हैं लेकिन राष्ट्रवाद की बात कोई नहीं करना चाहता हैं ! अगर यहीं रवैया बरक़रार रहा तो निश्चित रूप से संकट के समय इसकी कीमत देशवासियों को चुकानी पड़ सकती हैं ! जिन्होंने हमारी आन बान और शान के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया उनके लिए हमारा फर्ज बनता हैं की हम कुछ ऐसा करें की शहीदों के जीवन मूल्यों एवं आदर्शों त्याग,सेवा,और शौर्य के प्रतिक आजाद आजाद जी और समस्त शहीदों की शहादत दिवस में आम जनभागीदारी इतना भव्यतम रूप ले ले की भोली जनता कुत्तों की प्रदर्शनी से ऊपर उठाकर शहीदों की शहादत की झांकी को अंगीकार कर ले ! जिन लोगों ने अपने बलिदान की कीमत पर आजादी

का अमूल्य उपहार इस देश को दिया उसके देशवासियों से इतनी अपेक्षा तो की ही जा सकती हैं ! जयहिंद !

साहित्यकार आचार्य निशांतकेतु से प्रश्नोत्तर

Posted: 02 Mar 2011 02:15 AM PST

हिंदी के साथ विभिन्न भाषाओँ के सचल तीर्थ वागर्थ आचार्य निशांतकेतु जी जिन्होंने साहित्य का अपूर्व भंडार अपने अथक परिश्रम से साहित्य जगत को दे कर उपकृत किया है उन से डॉ. वेद व्यथित ने उन की रचना प्रक्रिया मूलक कुछ प्रश्न किये हैं :-

प्रश्न १ योशाग्नी शीर्षक आप का उपन्यास देश विदेश में खूब चर्चा में आया इस के विषय में मत तथा प्रतिमत बड़ी संख्या में प्राप्त हुए हैं शायद ही ऐसा किसी अन्य उपन्यास के साथ हुआ हो इस की कथा वस्तु के चयन की क्या प्रक्रिया रही और इस पर आप का लम्बा शोध भी रहा होगा तो इस के क्या २ अनुभव रहे ?

उ० योशाग्नी की भूमिका में मैंने इस की रचना प्रक्रिया के सम्बन्ध में विस्तार से लिखा है वहाँ मैंने स्पष्ट किया है कि इस का मूलाधार’ काम’ है काम से निष्काम की यात्रा होती है कामना और कमानियों के नाम और रूप मिलते हैं काम की निंदा भी की गई है प्रशंसा भी की गई है पुरुषार्थ चतुष्टय में जो क्रम है उस में काम का स्थान तीसरा है ठीक मोक्ष के पूर्व किन्तु काम को इतना दबा कर छिपा कर रखा गया कि वह अपराधिक बन कर रह गया जिस से लाभ के स्थान पर उस से सौ गुना हानि समाज को झेलनी पदी काम से राम भोग से योग अथवा सेक्स से सैल्वेशनकी यात्रा है उस में तांत्रिक पथिकों की अपनी विशेषता व महत्ता है काम के समय तीन ही प्रकार के आचरण शास्त्रों में उल्लिखित हैं दमन नमन व गमन

इस उपन्यास के माध्यम से वैदिक व तांत्रिक रचनाओं के आधार पर काम यहाँ श्रृंगारित और लाभदायी सिद्ध होता है मैंने उन सूत्रों को एकत्र कर अँधेरे में एक दीपक जलाया है

इस ग्रन्थ की रचना प्रक्रिया का सब से प्रमाणिक आधार है महात्मा गाँधी जी के साहित्य से प्रेरणा सन १९२१ के बात है बारीसाल की ३५० वेशयों ने महात्मा गाँधी को अपनी समस्याएं सुनने के लिए आमंत्रित किया वे वहाँ उपस्थित हुए और उन से १७ प्रश्न किये जिन का ‘नव जीवन ‘ में विस्तार से वर्णन है इस की प्रेरणा वहीं से प्राप्त है उपन्यास की नायिका अपर्णा के द्वारा उस के प्रेमी अंगराग को लिखे गये पत्रों की श्रंखला से भी मुझे प्रभूत प्रेरणा मिली इस सब का समाहार इस उपन्यास में है |

प० २ इस उपन्यास में परिवार व विवाह संस्था पर आप ने अलग ढंग से अपना मत प्रस्तुत किया है जो विवाह संस्था को एक प्रकार से अस्वीकार करता सा प्रतीत हुआ है क्या विवाह संस्था की नई व्याख्या की आवश्यकता है ?

उ० प्रेम , दाम्पत्य , परिवार व विवाह ये चारों शब्दों और इन की व्यावहारिक रूप रेख्यें भिन्न्हें इन में सब से सशक्त ,व्यापक अनादी और अनिवार्य है’ प्रेम ‘|प्रेम का क्षेत्र इतना व्यापक है कि उस के अंतर्गत वनस्पति से पशु पक्षी और मानव से परमात्मा तक सभी सम्मिलित हैं मानव हृदय में प्रेम का भाव स्वाभाविक और जन्म जात है इसे अवरूद्ध या विकृत करने से मानव जीवन अव्यवस्थित एवं विकृत हो जाता है दाम्पत्य भी प्राकृतिक ,स्वाभाविक ,आवश्यक और सामाजिक स्वरूप है संसार में प्रगिक्र्ण के मद्ध्य्म से वनस्पति वर्ग का फलं प्रति फलं होता है और उस की प्रजातियाँ सुरक्षित होती हैं मानव वेग में भी दाम्पत्य की प्रकृति और स्वभाव ,आकर्षण और आवश्यकता ,सामाजिकता व अपेक्षा होती है यहाँ दाम्पत्य के साथ प्रेम प्रेम का अवतं होने लगता है

विवाह एक सामाजिक संस्था है वह जन्म जात स्वभाव अथवा प्राक्रतिक भाव नही है मनुष्य की आवश्यकता और प्राकृतिक आकर्षण के आधार पर पुरुष नारी के प्रति अथवा नारी पुरुष के प्रति सम्मोहित होती है तो स्थायी भाव रति श्रृंगार रस में रूपांतरित हो ने लगती है फिर दाम्पत्य बनने लगता है यहाँ तक तो सब कुछ स्वाभाविक है किन्तु विवाह की सामाजिक व कानूनी घोषणा स्वाभाविक व प्राकृतिक नही है अत: जो प्राकृतिक नही है वह तो टूटेगा अथवा संशोधित होगा विवाह वेक ऐसी ही संस्था है प्रताड़ित हो कर विवाह का निर्वहन अथवा एक दूसरे के प्रति घृणा भाव रखते हुए वैवाहिक जीवन व्यतीत करना पशुता भी निकृष्ट है मानव समाज में सन्तति सुरक्षा के लिए परिवार एक आवश्यकता है वनस्पति वर्ग व पशुवर्ग सभी स्वत: संचालित जीवन धारा में प्रवाहित होते हैं उन की सन्तति शीघ्र ही स्वब्ल्म्बी हो जाती अहि जब कि मनुष्य की सन्तति को लम्बा समय लगभग १८ वर्ष लगते हैं इस लम्बी अवधि में इसे परिवार ही अच्छी तरह सम्भाल सकता है शारीरिक विकास ,मानसिक संतुष्टि और सामाजिक सम्बन्ध इन तीनो धरातलों पर निरीह मानव सन्तति को परिवार तो चाहिए ही सब से पहले प्रेम फिर दम्प्त्यफिर परिवार और अंत में विवाह इन सब में यदि सामंजस्य दिया जा सके तो यहाँ कोई व्यवधान नही इन में किसी एक छोड़ देने की बात की जाये तो वह विव्ह ही है क्यों कि विवाह भावके साथ मनुष्य उतन्न नही होता इसी पृष्ठ आधार पर मैंने विवाह संस्था पर संशोधन अथवा विकल्प की बात कही है इस स्थापना का एक उत्तम उदाहरन है योशाग्नी उपन्यास |

प्र० ३ बहुत से लोग इस पुस्तक का प्रकट रूप से विरोध भी करते हैं पर प्रच्छन्न रूप से इसे छाती से भी चिपकाये रहते हैं आप की दृष्टि में इस के क्या कारण हो सकते हैं ?

काम को समाज और परम्परा ने बड़ी निर्ममता और नासमझी के साथ कुचला है रति और श्रृंगार तथा प्रेम और आकर्षण प्राकृतिक हैं यह मनुष्य का जन्मजात स्वभाव है इस के उद्दाम वेग और दुर्दमनीय धारा को रोका नही जा सकता इस लिए आवश्यक है कि इस के लिए सहज ,स्वाभाविक और अनुकूल प्रवाह दी जाये जिस वस्तु एवं विचार को प्रतिबंधित किया जाता है उस की और आकर्षण बढ़ जाना मानव स्वभाव है सेक्स को छिपा कर अथवा दबा कर रखने के कारण मानव समाज का एक बड़ा हिस्सा पूरे संसार में एड्स ,उपदंश इत्यादि अनेक रति रोगों से ग्रस्त और विकलांग हो रहा है तथाकथित नैतिकतावादी अंधत्व पूर्ण धर्मिक्तावादी और अविचारित परम्परावादी समजिक्तावादी द्वारा यौनाचार के रहस्य को अंधकार में दुश्परिनामी स्वेछाचार के लिए छोड़ दिया और बाहर प्रकाश में यह कुचला गया है आवश्यकता इस बात की है कि स्वस्थ ,वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक रूप से यौनाचार का प्रशिक्ष्ण दिया जाये इसे विश्वविद्यालय में एक अनिवार्य प्रशिक्ष्ण का अंग बना देना चाहिए भारत में जिस शिव शिवा के अर्द्धनारीश्वर रूप को उपस्थित किया गया है वह आदर्श और अनुकरणीय है एडम व ईव को जिस वृक्ष का फल खाने को मना किया गया था उस के प्रति उन का आकर्षण इतना बढ़ गया कि वे वर्जित कार्य ही कर बैठे यह उपन्यास यौनाचार ,रति रहस्य व काम पुरुषार्थ के सूक्ष्म रहस्यों को इतनी स्पस्त्ता से व विश्वसनीयता से खोलता है कि इसे एक बार पढना आरम्भ कर देने वाले पाठक निश्चय ही इसे छाती से चिपकाये रखेंगे मैंने अपने व्यक्तव्य में कहा है और यह सच भी है कि कुछ पाठकों ने इसे ‘सर्वोल्लासतन्त्र्म ‘के सदृश सम्मान सहित लाल कपड़े में बाँध कर पूजा स्थल पर भी रखा है समाज के कुछ बलाकचारी मनुष्यों ने इस उपन्यास का नामोल्लेख भी पाप की श्रेणी में रखा है

भारत में काम देवता माना गया है काम दे जैसा शब्द प्रयोग विपुलता और सारथी के साथ उपलब्ध है काम कभी कुरूप नही हो सकता काम सौन्दर्य का सागर और एश्वर्य का आकाश होता है इस में सुख की संतुष्टि और आनन्द का उल्लास मिलता है इसे दबा कर रखना हिलते हुए फूल पर लोहे का कवच पहनाने जैसा है मेरी लेखकीय दृष्टि में योशाग्नि यदि ज्वाला मुखी का अग्नि सार है तो केसर पतल्श्री का पुष्पोद्यान भी है इस में कृषि कल्प का करिश्न्त्व है तो दूसरी कल्प ओर ऋषि का अनूत्त्रित आध्यात्म भी है इस ग्रन्थ की रसोपचिती के लिए जिस आस्वद्यता की आवश्यकता है उस के लिए एक अभ्यास संस्कार चाहिए जिन लोगों को रस्तम रसल फल आम्र के खाने से वमन हो जाता है उन के सम्बन्ध में मुझे कुछ नही कहना है |

प्र० ४ आप का दूसरा महत्व पूर्ण उपन्यास है ‘ जिन्दा जख्म ‘ इस उपन्यास की नायिका माहजबी के रूप में एक यवती ने अपने को साधारणीकृत रूप में घोषित किया है आज के आतंकवादी वातावरण में क्या माहजबी जैसी नायिका मिलना सम्भव है ?

उ० समाज में वस्तुत: दो तरह के लोग होते हैं एक तो वैसे लोग जो नीति नैतिकता ,अनुशासन एयर प्रशिक्ष्ण में बंध कर जीते हैं ऐसे लोग दूसरों के समक्ष अपनी उपस्थिति को बोझिल बना देते हैं दूसरे प्रकार के वे लोग वो होते हैं जो जीवन की धारा और वायु वेग की तरह जीते हैं नदी के तटबंध नहर की तरह पहले से बने बनाये नही होते इसी प्रकार वायु वेग में एयर कंडीशनर की एकतानता नही होती पवन के उनचास वेग रूप होते हैं किस समय और किस स्थल पर वायु वेग का कौन सा रूप उपस्थित हो जायेगा यह कहना कठिन है इस कोटि के व्यक्ति उसी समय निर्णय करते हैं कि क्या किया जाये जब जैसी परिस्थिति उत्पन्न होती है उस के अनुकूल वे आत्म निर्णय करते हैं ऐसे लोग स्वभाव और सहजता में जीते हैं वे किसी पर बोझ बनने की जगह उन से समरस स्वभाव में जीते हैं ‘जिदा जख्म ‘के दो पात्र ऐश्वर्य कान्त कुंतल और माहजबी ऐसे ही चरित्र हैं जो प्रशिक्षित जीवन के अपेक्षा प्राकृतिक एवं स्वाभाविक जीवन शैली में जीते हैं

परम्परा से प्राप्त दृष्टान्तों का अनुसन्धान किया जाये तो राम व कृष्ण इन दोनों जीवन वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं राम मर्यादा पुरुषोतम हैं जब कि कृष्ण लीला पुरुष नटवर राम वही करते हैं जो न्याय और उचित है कृष्ण इस के विलोम हैं वे जो कुछ करते हैं वही औचित्य और मर्यादा के रूप में स्वीकृत हो जाता हियो दोनों महान हैं अवतारी पुरुष और लोक नायक हैं लेकिन इतना टी सत्य है कि प्रशिक्ष्ण से स्वभाव ,संस्कृति से प्रकृति और चित्त से आत्मा बड़ी है माहजबी एक उच्छल जीवन धारा प्रकृति प्रवाह और उल्लास भाव है इस लिए वह आत्म नन्दिनी के साथ लोक रंजिनी भी सिद्ध होती है यह प्रकृति और स्वभाव के निकटतम है समाज को ऐसे चरित्र की आवश्यकता है समाज में ऐसे चरित्र के दृष्टान्त भी अनेक हैं

आप ने अपने ब्लॉग पर भी एक युवती के चरित्र को प्रस्तुत कर के इस की पुष्टि की है |

जिन्दा जख्म की नायिका को अंत में आप ने आतंकी गोली का शिकार बनवाया है क्या उस का जिन्दा रह कर क्त्त्रप्न्थ से लड़ना जरूरी नही था ?

चौबीस कैरेट सोने से गहने नही बनते गहने के लिए शुद्ध सोने टांकीकी मिलावट आवश्यक है समाज के जो व्यक्ति मिलावट से रहित अपनी आत्मा और बाहर प्रक्रति के साथ जीते हैं समाज उन्हें जीने नही देता सुकरात, जीजस ,महात्मा गाँधी मार्टिन लूथर अब्राहिम लिंकन जून ऍफ़ केनेडी या ऐसे हजारों उदाहरन हैं जिनको समाज ने इस लिए मार दिया कि उन में मिलावट नही टी पारदर्शिता ही उन के लिए अपराध बन गई माहजबी पूई मनुष्यता का प्रतिनिधित्व करने वाली महिला है उस में सौन्दर्य व एश्वर्य दोनों का संयोग है इस उपन्यास के आरम्भ में जो कुछ स्थापनाएं उपस्थित की गई हैं उन आध्यात्म को सर्वोपरी महत्व देते हुए धर्म या मत को अस्वीकार किया गया है संसार में तीन सौ धर्म हैं समाज का समूचा वर्ग तीन सौ खंडों में विभाजित किया गया है इसी प्रकार भाषा ,जाती देश रीति रिवाज ,वेश इत्यादि अनेक आधारपर मनुष्यता खंड खंडित है मनुष्यता का साम्रस्त्यइन खंडों में खो गया है पूरी तरह शुद्ध स्वर्ण ,शुद्धात्मा व्यक्ति ,पारदर्शी झील अप्रदूषित आकाश का अस्तित्व संसार को सह्य नही होता अत: माहाजाबी का आतंकी गोली का शिकार होना स्वाभाविक है ऐसे व्यक्तियों के प्रति समाज आतंक का विस्फोट करता है आतंक और भी दोनों ही पशुता हैं

एक बाघ आतंक फैला कर मृग का शिकार कता है और मृग भयभीत हो कर भागता है दोनों पशु धर्म और गुण हैं ऐश्वर्य कान्त कुतल और माहजबी दोनों पशुता के पर्याय आतंक के विरुद्ध संघर्ष करते हैं परिणामत: ऐश्वर्य कान्त कुंतल विकलांग बना दिए जाने पर पीड़ा का जो मार्मिक प्रसंग उत्पन्न होता है वह हजार हृदयों में सैदेव सुलगता रहता है यदि वह जीवित रह पाती एयर संघर्ष करती रहती तो ऐसा प्रभाव उतन्न नही हो पता इस लिए माहजबी का शहीद होना ही स्वाभाविक है |

इस उपन्यास के नायक ऐश्वर्य कान्त कुंतल का कट्टर पन्थ से लड़ने के लिए पाकिस्तान चले जाने का कार्यक्रम कहाँ तक उचित है पाकिस्तान के कट्टर वातावरण में उनके क्या कार्यक्रम होंगे और उन की क्रियान्विति कैसे होगी इस बात का उपन्यास में उल्लेह नही है ?

कथा साहित्य में सभी बातें खुलकर नही लिखी जाती प्रसंगों के आधार पर प्रच्छन्न तत्व तथा कतहा श्रृंखला को समझने की आवश्यकता होती है दूसरी बात यह है कि जो आत्मोपलब्ध व्यक्ति होते हैं वे कार्यक्रम और प्रकल्प बना कर नही जीते वे जहां उपस्थित होते हैं वहीं उस स्थान ,काल और समस्या के आधार पर समाधान उपस्थित करते हैं जो उन की आत्मा की आवाज होती है सभी बुद्ध पुरुष ऐसा ही करते है अकास में म्द्रते बादलजिस स्वछंदता और आत्म वृति में जीते हैं वह किसी अनुशासन अथवा पूर्व निर्धारित परिनियमों से बंधा नही है स्वछन्द ही छन्दस सौन्दर्य बन जाता है किसी भी देश और काल की इकोलोजी से वह समरस हो कर वहीं बरस जाता है यही पर्जन्य स्वभाव व पर्जन्य सिद्धांत है पर्जन्य आकास के फलक पर सौन्दर्य के विभिन्न दृश्य उपस्थित करते हैं वहाँ व्र्संत में इंद्र धनुष भी उगते हैं जैसे सबों के लिए उन्मुक्त आनन्द का आमन्त्रण टोरं द्वार |ऐश्वर्य कान्त कुंतल पर्जन्य पुरुष हैं वे कभी किसी बंधन में नही होते देश की सीमाएं उन की दृष्टि में निरर्थक हैं वे हिन्दू मुसलमान जैसा भेद भाव भी नही मानते हिन्दू मुसलमान या इसी कहे जाने से पहले वे क्या थे कवक एक शुद्ध और पारदर्शी मनुष्य और मनुष्यता इसे लोग वेद और पूरण पढ़ कर नही जीते वर्ण जी कर वेद और पूरण की रचना करते हैं वे अगर पाकिस्तान जा आतंक के उन्मूलन के लिए काम करना चाहते हैं तो हम इसे करुणा का क्षैतिज विस्तारं मानेगे यही ‘करुणा एव एको रस: ‘सिद्धावस्था में पहुंचा हुआ सूत्र बन जाता है भ्रमों का आवरण टूटने पर पारदर्शी मनुष्य का अवतरण होता है प्रकृति ने पृथ्वी बनाई है जिस पर सबों का अधिकार है हवा भी एक ही है जिस में सभी साँस लेते हैं अग्नि की ऊष्मा और आकाश का विस्तार भी सबों के लिए समान है समाज ने खंडन की परम्परा बनाई और लोगों ने टुकड़ों में जीने के लिए लाचार कर दिया ऐश्वर्य कान्त इस का विरोध करते हैं उन के लिए हिन्दुस्थान पाकिस्तान का बंटवारा और हिन्दू मुसलमान जैसा विभाजन बेमानी है वे अविभाजित भूगोल और अखंडित मनुष्यता में आस्था रखते हैं इसी अंड में वे पाकिस्तान जाते हैं राष्ट्र और धर्म के आवरण के पहले जिस अराष्ट्र और धर्म साहित्य का अस्तित्व था वही मानव वंश की आपेक्षित प्रकृति है |

प्र० हिंदी साहित्य में बहुत से साहित्य आन्दोलन चले ,पर काफी समय से एक खालीपन का अनुभव हो रहा है उत्तर आधुनिकता वादी अपना स्वरूप निर्धारित नही कर सके कुछ उपयोगिता वादी .यथार्थ वादी भी साहित्य में अपना स्थान नही बना पाए आप को क्या लगता है ?निकट भविष्य में साहित्य की २ आन्दोलन देने वाला है ?

उ० आप ठीक कह रहे हैं हिंदी साहित्य में उत्तर आधुनिकता के धरातल पर कोई उल्लेखनीय आन्दोलन क्रांति या हलचल नही हुई पहले धर्म ने साहित्य को अनुगामी बनाया था बाद में राजनीति ने विज्ञानं के प्रभाव ने भी साहित्य की धारा में बाधा उत्त्पन्न की है पत्र साहित्य भी साहित्य के अंतर्गत एक महत्व पूर्ण विधा है मोबाईल के व्यापक प्रचार ने पत्र लेखन को भी प्राय: स्प्माप्त ही कर दिया है गाँधी जी के पत्र आचर्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ,आचर्य शिव पूजन शय और नलिन विलोचन शर्मा के पत्र हिंदी साहित्य की धरोहर हैं ऐसे और भी पत्रिक साहित्य हिंदी में उपलब्ध हैं इंटरनेट ,डाट कॉम ,ब्लॉग ,लैपटाप कम्पुटर इत्यादि ने क्रांति उपस्थित की है ग्रन्थ पुस्त्काल्ट और वाचनालय एक सीडी के माध्यम से जेब में समा जाते हैं कलम के निर्माण और विक्रय पर भ चोट आई है अब उँगलियाँ कलम पकड़ने की जगह कम्पोज करती हैं तात्विक शोध की एक स्वस्थ्य परम्परा रही है जिस को बहुत ही शिथिल किया गया है नेट पर बहुत सारी सूचनाये बहुत से ग्रन्थों से ले कर एकत्र कर दी जाती हैं मूल ग्रन्थ का साक्षात् किये बिना इंटर नेट के सहारे शोध सम्पन्न कर लना बिलकुल अधूरापन है यह ठीक है कि उत्तर आधुनिकता के इस काल में श्रेष्ठ रचनाएँ नही हो रही हैं समय आभाव व झितित के इस युग में हर चीज छोटी होती चली जा रही है बाजार वाद और शीग्रता के इस युग में न तो कोई अभिज्ञान शाकुंतलम पढ़ता है न राम चरित मानस न रामायण न ही महाभरत न बालजाक पढ़ता है न ही सेकश्पीयर जो मूल का आनन्द ऐ उस से व्यक्ति वंचित रह जाता है

यद्यपि यह बोनापन का युग है किन्तु प्रज्ञा का घनत्व घटा नही है कोई वामन ही विरत बन जाता है बिंदु सिन्धुत्व धारण कर सकता है एक प्रकार से सूत्र शैली का इसे पुनर्जागरण कह सकते हैं |

प्र० क्या साहित्य को वाद से उपर उठ कर मानवीय स्म्वेद्नायों के अधिक निकट होना चाहिए था या वाद में फंसना चाहिए या तथाकथित मठाधीशों के चंगुल से साहित्य को बाहर रहना चाहिए?

उ० आप की चिंता स्वाभाविक है वाद ग्रस्त और मठाधीशों का शरण आश्रय दोनों ही गलत हैं बिना उन्मुक्ति और स्वछंदता के विराट और सनातन कार्य नही हो सकता ,किन्तु विचारक और आलोचक प्रत्येक रचनाकार को किसी न किसी वाद में बांध कर ही देखना चाहते हैं किसी रचना कार का उस की स्वतंत्र गुणवत्ता के आधार पर उस का मूल्यांकन सचमुच कठिन काम है इस से उन्हें सहूलियती होती है फिर निश्चय ही इस प्रक्रिया के द्वारा वे निष्पक्ष मूल्यांकन नही कर पाते हैं तटस्थ मूल्यांकन और विश्लेष्ण का यहाँ आभाव है

यहीं प्रतिबद्धता का प्रश्न उठता है यदि कोई प्रतिबद्ध है तो वह वाद से बद्ध है अथवा वाद्ब्द्ध है तो स्वाभाविक वह प्रतिबद्ध है वाद शेष को अशेष से खंडित कर अलग कर देता है वहाँ समूचा पन नही होता जहाँ तक साहित्य का प्रश्न है यह भाव समरस दृष्टि ,निर्वाद बोध निश्प्र्तिब्द्ध नीति और मूल सौन्दर्य शिल्प के साथ संयुक्त और सम रस है अपने को कंद कर खड़ा कर लेने से अखंडता का विराट लोक नही दीखेगा घटाकाश का घेरा जब तक नही टूटता तब तक महाकाश की अनुभूति नही होती इस के लिए कुछ करना नही होता यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है घटाकाश टूटते ही महाकाश उपलब्ध हो जाता है

प्र० आज दलित साहित्य की चर्चा जोरों पर है इस में भी कुछ मठाधीशों से ही कहना पूर्ति हो रही है क्या साहित्य को भी नागरिकों की भांति उदासीन रहना चाहिए स्वयम दलित, महिला अल्पसंख्यक आदि अपने खेमे से बाहर जा रहे हैं इस पर आप के विचार ?

उ० दलित और अदलित जैसा विभाजन रचना कार और साहित्य दोनों के लिए खतरनाक है साहित्य का अर्थ ही होता है सब के साथ सामरस्य वहाँ एकत्व ,विश्व्त्व एवं सनातनत्व की भावना प्रबल होती है वहाँ कोई भेद भाव नही होता वहाँ रागद्वेष की भवना उत्पन्न नही होती जब हम अखंड से खंड को कट कर कहीं खड़ा कर देते हैं बगीचा से फूल तोड़ कर ड्राइंग रूम में सजा देने से पूरा बगीचा उपस्थित नही होता

संत कवि रविदास बेशक किसी भी जाती से सम्बन्धित थे परन्तु उन्होंने ‘प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी ‘जैसी मार्मिक पंक्ति लिखी है क्या हम उसे दलित साहित्य माने और कवि को दलित कवि ?संत कबीर जुलाहा थे उन के साहित्य में साहित्य को क्या दलित वर्ग में ही रखना होगा ?फिर यह निर्देश भी उपस्थित करना होगा कि इसे केवल इसे दलित लोग ही पढ़ें दलित और द्लितेतर साहित्य का बंटवारा अमानवीय एवं लघु चिन्तन का परिणाम है मैं इस अप्राकृतिक एवं अस्वाभाविक विभाजन के दृष्टिकोण के विरूद्ध हूँ |

प्र० क्या प्रश्नोत्तर को साहित्य की एक स्वतंत्र विधा में स्वीकार किया जाना चाहिए ?

उ० प्रश्नोत्तर वांग्मय की प्राचीनतम विधा है तुटली आवाज में एक नन्हा सा बच्चा एक पक्षी को देख कर अपने पिता से पूछता है ,यह क्या है ? अनुभवी पिता उत्तर देता है और बालक ग्यानाब्द्ध होता चला जाता है यही क्रम गुरु शिष्य के बीच में चलता है फिर समाज के धरातल पर व्यक्ति विभिन्न समस्याओं के बीच उन के समाधान के लिए खड़ा होता है तब प्रश्नोत्तर का व्यवहारिक क्रम बनने लगता है प्रश्न से उत्तर निकलते हैं समुद्र मंथन होने पर चौदह रत्न निकले थे यह ठीक है कि सभी रत्न समुद्र में विद्यमान थे किन्तु उन का उद्भव व प्र्क्तिक्र्ण समुद्र मंथन से ही हुआ था महाभारत में यक्ष प्रश्न के अंतर्गत १२६ प्रश्न और उन के उत्तर दिए गए हैं यह प्र्शोत्तर आज भी ज्ञान वर्धक हैं महाभरत के गीता खंड में भी प्रश्नोत्तर विधान है या तो धृत राष्ट्र संजय से प्रश्न करते हैं अथवा अर्जुन कृष्ण से संस्कृत के अनेक सुभाषित ग्रन्थ इसी प्रश्नोत्तर शैली पर आधारित हैं प्रश्नोत्तर शाश्त्रर्थ का ही सुनियोजित रूप है इसे साहित्य की सशक्त और अपरिहार्य विधा के रूप में स्वीकार कर लेने में कोई आपति नही होनी चाहिए |

प्र० वर्तमान साहित्य जगत के लिए आप के क्या संदेश और आशीर्वाद हैं ?

सच पूछिए तो साहित्य का पाठक किसी संदेश और आशीर्वाद की अपेक्षा नही रखता जो भी हम से ऐसी अपेक्षा रखते हैं उन्हें मेरे साहित्य से गुजरना होगा संदेश और सुभकामना सब कुछ वही उपलब्ध हैं संदेश और शुभकामना प्रकट करने वाले ऊंचाई पर बैठ जाते हैं और श्रोता पर बोझ बन जाते हैं सच्चा साहित्यकार कभी किसी पर बोझ नही बनना चाहता वह समरस होना जनता है उस की प्रकृति असम्बद्ध और स्वच्छंद की होती है धर्म गुरुओं और संत परम्परा में उपदेश की परम्परा है साहित्य में तो हद से हद “कन्तासम्मितात्योप्देश्युजे “का स्वरूप माना जाता है रचना कार सभी भूत (मानव ,पशु पक्षी ,वनस्पति )इत्यादि पर अपने स्व का विस्तारं कर फ़ैल जाता है और फिर अपने भीतर समान रूप से सब को स्थान देने वाला व्यक्ति साहित्यकार बन जाता है ईशोपनिषद की पंक्ति है

यस्तु सर्वाणि भूतान्यत्म्न्ये वानुप्श्यती

स्र्व्भूतेशु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते

 

सुकन्या कहाँ है , राहुल गाँधी से कोर्ट ने माँगा जवाब

Posted: 01 Mar 2011 11:45 PM PST

के युवराज जो भारत का प्रधानमंत्री बनने के सपने देख रहे हैं उन पर एक युवती समेत उसके परिजनों को गायब करने का आरोप लगा है | हालाँकि सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर ऐसी बातें पिछले दो-तीन सालों से चर्चा में है लेकिन अब तक इसे महज अफवाह मान कर देखा जा रहा था | विगत मंगलवार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक युवती और उसके परिवार को गायब करने के सम्बन्ध में राहुल गांधी और उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को नोटिस जारी किया है।

मध्य प्रदेश के पूर्व विधायक किशोर समरीते द्वारा दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि अमेठी के बलराम सिंह की 24 वर्षीया पुत्री सुकन्या सिंह और उसका परिवार 13 दिसम्बर 2006 को राहुल गांधी से उनके संसदीय निर्वाचन में मिला था। तब से ही युवती और उसका परिवार ‘लापता’ है। कांग्रेस नेता और उनके पांच ‘विदेशी मित्रों’ ने कथित रूप से 24 वर्षीया सुकन्या सिंह पर हमला किया।

आईएनएस के अनुसार याचिकाकर्ता समरीते ने कहा कि एक वेबसाईट पर इस खबर को देखने के बाद उन्होंने अमेठी आकर देखा कि लड़की के घर पर ताला लगा है। परिवार कहां है, इस बारे में ग्रामीण कुछ भी बताने के लिए तैयार नहीं हैं।”

मीडिया मेनेजमेंट के जरिये देश भर में दलित और युवा प्रेमी की छवि गढ़ने वाले युवराज पर यूट्यूब पर जारी एक विडियो में भी एक लड़की के साथ बलात्कार की बात प्रस्तुत की गयी है | न्यू मीडिया के इस युग में अक्सर लोग भूल जाते हैं कि मीडिया चैनलों और अख़बारों को खरीद लेने से उनकी मनमानी नहीं चलने वाली है | राहुल को अदालती नोटिस इस बात का प्रमाण है कि वेबसाईट पर प्रकाशित एक खबर को लेकर भी लोग न्यायलय भी जा सकते हैं | बहरहाल , मामला भले ही आरुषि जैसी हाईप्रोफाइल ना होकर एक गरीब लड़की की इज्जत और उसकी जिंदगी से जुड़ा है लेकिन इस मामले की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए |

 

गोधरा फैसले से फरेबी साबित हुए लालू

Posted: 01 Mar 2011 11:02 PM PST

प्रशांत सिंह

लालू प्रसाद यादव जी हां ये नाम अचानक याद आ गया। दरअसल मंगलवार दिनांक 22.02.2011 को गोधरा साबरमती एक्सप्रेस अग्निकांड पर फैसला आया। इस फैसले ने अचानक लालू की याद दिला दी। लालू बेहद लोकप्रिय नेता है। पूरे देश में उन्हें पसंद किया जाता है, लेकिन ये समझ में नहीं आता कि लालू झूठ और फरेब का सहारा क्यों लेते हैं। क्या लोकप्रियता झूठ और फरेब से ही हासिल की जा सकती है। यदि ऐसा है तो फिर पूरे देश में ये संदेश दिया जाना चाहिए। वैसे भी लालू जैसे लोग इस तरह से करेंगे तो फिर आनेवाली पीढ़ी तो झूठ फरेब और भ्रष्टाचार के पीछे तो भागेगी ही। 27 फरवरी, 2002 को गुजरात में गोधरा रेलवे स्टेशन के पास साबरमती ट्रेन की एस-6 कोच में आग लगा दी जाती है। इस आग की चपेट में आकर 59 कारसेवकों की मौत हो जाती है। इस मामले में 1500 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाती है। उन पर आतंकवाद निरोधक कानून पोटा लगा दिया जाता है। इस अग्निकांड के सिलसिले में जिन्हें गिरफ्तार किया जाता है वो अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। अग्निकांड के बाद 28 फरवरी से 31 मार्च 2002 के बीच गुजरात के कई इलाकों में दंगा भड़कता है जिसमें 1200 से अधिक लोग मारे जाते हैं। मारे गये लोगों में ज्यादातर अल्पसंख्यक समुदाय के लोग होते हैं। उस वक्त सत्ता में भाजपा की नरेंद्र मोदी की सरकार होती है। मोदी सरकार हिन्दू कारसेवकों की मौत का बदला निकालती है। वो अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी वाले इलाकों से पुलिस और सुरक्षा बल हटाकर बहुसंख्यक समुदाय की आबादी वाले इलाकों में फोर्स को लगा देती है। मंशा साफ रहती है कि अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को ज्यादा से ज्यादा नुकसान हो। अल्पसंख्यक समुदाय को ज्यादा नुकसान होता भी है। मगर उसके बाद भी गंदी राजनीति नहीं रुकती। कारसेवकों को जलाने के मामले में फैसला आ गया है फिर भी राजनीति का गंदा चेहरा सामने से हटने का नाम नहीं ले रहा। एक तरफ नरेंद्र मोदी हिन्दुओं को खुश कर रहे हैं तो दूसरी ओर लालू ने अल्पसंख्यक समुदाय को खुश करने के लिए 4 सितंबर 2004 को बनर्जी आयोग का गठन कर दिया। इस आयोग ने लालू के मन के मुताबिक अपनी रिपोर्ट दे दी। रिपोर्ट में कहा गया कि आग बाहरी तत्वों ने नहीं लगाई। आग बोगी के अंदर से लगी थी। यानि आग कारसेवकों की गलती का नतीजा हो सकता है। वहीं नानावती आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि आग बाहर से लगाई गई थी और ये पूर्वनियोजित साजिश का हिस्सा था। अदालत ने अपने फैसले में नानावती आयोग की रिपोर्ट पर अपनी मुहर भी लगा दी है। अदालत ने अग्निकांड को साजिश माना और 31 लोगों को दोषी करार दिया। मौलवी सईद उमरजी को इस अग्निकांड का मुख्य आरोपी बनाया गया था, उन्हें सबूतों के अभाव में अदालत ने बरी कर दिया। कोर्ट ने 94 आरोपियों में से 63 को मामले से बरी कर दिया। लालू के लिए एक सबक होना चाहिए कि गंदी राजनीति से ज्यादा दिन तक सत्ता पर राज नहीं किया जा सकता। अच्छा काम करने पर सभी उसका सम्मान करते हैं और उसका नतीजा भी पक्ष में आता है। बिहार में नीतीश कुमार ने अच्छा काम किया। उन्हें उसके सकारात्मक नतीजे मिल रहे हैं। लालू ने बिहार के लिए गलत किया। नतीजा ये है कि आज उनको बिहार की सत्ता के लिए तरसना पड़ रहा है। चाहे अल्पसंख्यक समुदाय हो या फिर बहुसंख्यक समुदाय कोई गलत करेगा उसकी सजा उसे जरूर मिलनी चाहिए। चलिए अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ लोगों ने गलत किया। उन्हें उसकी सजा मिलने जा रही है। अब गुजरात दंगों के जो लोग दोषी हैं उन्हें सजा कब मिलेगी। बड़ा सवाल है उम्मीद है जवाब जल्दी मिलेगा।